हफ्ते की किताब: पल्लव- ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’

भारत में भूमंडलीकरण या उदारीकरण अथवा साफ़ साफ़ कहें तो बाजारीकरण की प्रक्रिया ने गहरे बदलाव किए हैं। अकारण नहीं कि इस प्रक्रिया के प्रारम्भ होने के बाद अधिकाँश साहित्यकारों की चिंता में यह परिघटना है। बीते दशकों के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में इस परिघटना के मनुष्य विरोधी और धन लोलुप चेहरे को बार बार देखने-समझने की गंभीर कोशिशें मिलती हैं। अलका सरावगी का नया उपन्यास ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘ इस वृहत्तर सन्दर्भों वाली प्रक्रिया के आस पास का उपन्यास है जो बंगाल के भूगोल में रचा गया है और इस परिघटना के काफी पहले से अपनी शुरुआत करता है।

Alka Saraogiउपन्यास का वाचक जयदीप उर्फ़ जयगोविंद हमें अपनी कहानी सुना रहा है जो अमरीका से इंजीनियरिंग की ऊंची पढ़ाई कर कलकत्ता लौटा है। उसका विदेश पलट होना जहाँ जातीय स्वाभिमान की मद्धिम खोज है वहीं यह असफलता भी है जो उसे लगातार मथती भी है। जैसे यह प्रसंग – ‘इस देश में फारेन-रिटर्न्ड होना वरदान है या श्राप है, उसे अब ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा था। यहाँ हर आदमी विदेशों से आई छोटी-से-छोटी चीज के लिए भी लालायित दिखता है। उसने अपने एक अमेरिकी दोस्त पैट्रिक से सुना था कि दिल्ली की सड़कों पर उसने अपना लाइटर, पेन और घड़ी बेचकर रहने का सारा खर्च निकाल लिया था। पैट्रिक के पीछे जब-तब लोग पड़ जाते थे और पूछते थे कि क्या उसके पास बेचने के लिए फारेन का कुछ सामान है। कस्टम्सवाले एयरपोर्ट पर हर आनेवाले की तरफ भिखमंगों की तरह देखते रहते हैं कि कुछ मिल जाए। अक्सर लोग उनके लिए सिगरेट का पैकेट या एक चाकलेट ले आते हैं ताकि वे लोग परेशान न करें। बाहर से आनेवाला हर शख्स यहाँ के लोगों के लिए जैसे कोई कल्पवृक्ष है। पर अब जब वह यहाँ आकर रह ही गया है, तो लोगों को न जाने क्या परेशानी है। वे जैसे उसे किसी-न-किसी तरह पीटकर उसके अंदर से अमेरिका का भूत निकालना चाहते हैं। उसे ऐसा लगता है कि सिवाय उसके परिवार के हर आदमी चाह रहा है कि वह वापस अमेरिका लौट जाय। हर आदमी जैसे कह रहा है कि उसके लिए यहाँ कोई जगह नहीं हो सकती।’

जैसा की कहा गया है यह उपन्यास लम्बे समय देखता है घेरता है। नक्सलबाड़ी से विकिलीक्स तक। जिसमें भारत नाम के राष्ट्र राज्य की तमाम असफ़लताएं आती गई हैं। अलका सरावगी का लक्ष्य इन असफ़लताओं का वर्णन करना नहीं है और न ही वे पूंजीवादी सभ्यता का क्रिटिक रच रही हैं ।यहां जयदीप उर्फ़ जयगोविन्द के बहाने वे अनेक सवाल करती हैं और असल में एक मनुष्य की सफ़लता-असफ़लता के बहाने जीवन व्यवस्था की सफ़लता-असफ़लता देखना ही उनकी रचना सिद्धि है । इन्दिरा गांधी के भारत का हाल देखिये – ‘फँस गए तुम जयदीप। तुम ही नहीं, इस देश में हर आदमी फँसा है। प्रिवी पर्स खत्म कर और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इंदिरा गांधी ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाकर वोट बटोर रही है। गरीबी तो जाने हटेगी या नहीं, पर दुनिया की टक्कर का सामान बनाने का सपना तो सबको भूल ही जाना चाहिए। हर आदमी इसी फिराक में लगा हुआ है कि कैसे वह ज्यादा-से-ज्यादा पैसा कमा ले। इससे ज्यादा इस देश में कोई कुछ सोच ही नहीं पाता। पूर्वी पाकिस्तान में आजादी के लिए लड़ाई चल रही है। लाखों लोग सीमा में इस पार आ गए हैं। कलकत्ता शहर में ट्रेड यूनियनों ने पहले ही कोई कम मुसीबतें नहीं खड़ी कर रखी थीं। अब रिफ्यूजी आकर रही-सही कसर पूरी कर रहे हैं। पर हर युद्ध में कुछ लोग पैसे जरूर कमाते हैं। हिन्दमोटर कम्पनी के पास बेडफोर्ड ट्रक के आर्डर आए हैं। कारखाने की भारी ‘प्रेसिंग’ मशीन को एम्बेडेसर गाड़ी बनाने से फुरसत नहीं है, ट्रक कैसे बनेंगे? एक ही उपाय है कि लोहारों के यहाँ ठोंक-पीट कर ट्रक तैयार करवाए जाएँ। पर कम्पनी बदनामी के डर से यह काम बाहर नहीं करवा सकती। इसलिए कम्पनी के अंदर ही यह काम करवाया जा रहा है। मुनाफे का कोई मौका छूटना नहीं चाहिए- यही मानो मूलमंत्र है इस देश का।’ उप्न्यास में एक प्रसंग है जब जयदीप को उसके पिता के मार्फ़त बिड़ला जी के इस कारखाने में काम मिलता है और जाहिर है वहां अमरिका पलट इस नौजवान के लिए कोई स्वागत भाव नहीं है। विडम्बना यही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त यह इन्जीनियर पहले मन्टू चौधरी और फ़िर राजाराम बाबू जैसे नेता के लिए दलाल जैसा कुछ बन गया है और उपन्यास के अन्त में तो वह प्रीतम भन्साली जैसे अपराधी के लिए काम करता है ।

jankidas_tejpal_mention_hbउपन्यास में जयदीप के पिता अर्थात एडवोकेट बाबू और जयदीप के बेटे रोहित भी आए हैं । क्या यह इन तीन पीढियों की कहानी है? एडवोकेट बाबू नेहरू युग के चुप्पा आदमी हैं जो बिड़लाजी के यहां भी पहुंच रखते हैं और यह उनकी हिम्मत थी कि बेटा अमरीका पढने जा सका । रोहित अमरीका में ही है और उसे अपने पिता की तरह वापस भारत नहीं लौटना है। रोहित भारत को चिड़ियाघर कहता है और उसका कथन है-‘ तुम्हें पता है डैड, किसी काले आदमी से एक हिन्दुस्तानी जितना बुरा व्यवहार कर सकता है, उतना एक गोरा कभी नहीं करेगा।’ थोड़ी सी कहानी एडवोकेट बाबू की भी है जो राजस्थान से आए थे एक बंगाली सेेठ के इतने प्रिय हो गए थे कि उन्हें ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘ में रहने के लिए जगह मिली। उपन्यास की वर्तमान धुरी यह है कि इसी ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘ को मेट्रो के लिए तोड़ा जा रहा है और जयदीप इसे बचा लेना चाहते हैं। विदेश भागने और विस्थापन के कारणों की तलाश जैसा कुछ उपक्रम भी उपन्यास करता है।  एक जगह आया यह वाक्य देखिए-  ‘पांच हजार साल पुरानी यह सभ्यता अपना मन लगाने लिए जाने कितने पुराण, कथाएँ,किंवदन्तियाँ बना चुकी है और फिर भी बनाती जा रही है। इसलिए इस देश में विज्ञान की कोई जगह नहीं। सारे वैज्ञानिक-डाक्टर-इंजीनियर मौक़ा लगते ही विदेश भाग लेते हैं।’

उपन्यास में स्त्रियां भी हैं और वे खासी स्थिति में हैं। एडवोकेट बाबू की पत्नी यानी जयदीप की मां का उस पर गहरा असर है तो जयदीप की पत्नी दीपा इतनी मजबूत है कि अपने पति के लिए यह वाक्य बोल सकती है -‘आदमी की अपनी असफलता सिर्फ उसी की जिम्मेदारी नहीं होती; यह पूरे ‘सिस्टम’ की नाकामी है।’ दीपा ही जयदीप को मिंटू चौधरी से दूर करती है और  नाकामियों के बावजूद उसे पति पर भरोसा है। ‘आदमी दुनिया में साए बिना रह सकता है, पहचान के बिना नहीं।’ जानकी दास तेजपाल मैनशन से निकलने के बाद कोई फ्लैट अगर जयदीप के लिए घर था भी तो सिर्फ इसलिए  कि वहां दीपा थी। उपन्यास का अंत एक स्त्री के प्रसंग से होता है और इसे अलका सरावगी ट्रेजिक साम्य से गढ़ रही हैं। जिन दिनों जयदीप भंसाली के लिए जमीन खाली करवाने की दलाली कर रहा था तब एक बुढ़िया है जो किसी कीमत पर जमीन छोड़ने के लिए राजी नहीं है। उसे किसी तरह धोखे से जयदीप के लोग हटाने में सफल हुए हैं और यही वह दिन भी है जब ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘ से उसे भी रुखसत लेनी होती है। अलका सरावगी कथा के बीच बीच में पाठक के साथ चुहल करना जानती हैं तभी तो वे कह सकी हैं – ‘भारत की प्राचीन महान सभ्यता अपने बच्चों पर जासूसी करने में दुनिया की केजीबी और एफबीआई को मात दे सकती है। ‘ और बंगाल में रहने के बावजूद बंगाली अहंकार को भी दरेरा देती हैं – ‘एकाध रवीन्द्र नाथ या सत्यजित राय क्या हो गए, हर बंगाली को लगता है कि उसकी संस्कृति का साम्राज्य दुनिया-भर में फैला है। वह कहीं रहे, धरती से दो कदम ऊपर चलता है।’ शायद मारवाड़ी बंगाली होने की छूट से यह चुहल सम्भव हुई है।

उपन्यास में नक्सलवाद का सीधा जिक्र नहीं है लेकिन जयदीप के बहाने यह प्रसंग आया है। जयदीप का एक मित्र देवनाथ नक्सली हो गया था और अब वही इसी बड़ी कंपनी में अफसर है। बेकारी के दिनों में जयदीप को वह नौकरी के इंटरव्यू के लिए बुलाता है और जाहिर है नौकरी भी नहीं देता। उससे बात करते हुए जयदीप शांतनु बनर्जी को याद करता है जो बड़ा क्रांतिकारी था। देवनाथ की टिप्पणी थी – ‘बंगाली जन्मजात रोमांटिक है और अभी नया रोमांस नक्सलवाद है।’ लेकिन इस प्रसंग के आखिर में आई यह टिप्पणी बहुत कुछ कह देती है – ‘एक तरह से देखा जाए, ये सारे लोग न जाने खुद मूर्ख बन रहे थे या दुनिया को मूर्ख बना रहे थे। उन्होंने अपने जीवन पर खेलकर ख़तरा उठाया था, इसमें कोई संदेह नहीं था। उन्हें लग रहा था या उन्हें सिखाया गया था कि परिवर्तन सिर्फ ऐसे ही हो सकता है। और कोई रास्ता नहीं बचा है। वे सचमुच दुनिया को बदलना चाहते थे। पर जहां दूसरे पक्ष की ताकत ने उन्हें कुचला, वे उसी पक्ष के हिस्से हो गए।’

कलकत्ता के बड़ा बाजार के मध्य स्थित ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘ का ढहना उपन्यास की नजर में कलकत्ता के इतिहास और यहां की संस्कृति का ढहना है। कलकत्ता के पुराने वैभव को याद करने वाले कुछ वाक्य भी उपन्यास में आए हैं और गृहकार्य में पर्याप्त दक्ष विद्यार्थी की तरह उनका भी क्रिटिक खोजा गया है। क्या इसी से उपन्यास की सफलता और सार्थकता सिद्ध होनी चाहिए ? उपन्यास संक्षिप्त कलेवर में है और शिल्प की चमक लाने का परिश्रम भी किया गया है। जयदीप अपनी कहानी को औपन्यासिक रूप देने में लगा है और बीच  बीच में इस लिखे जा रहे उपन्यास के अध्याय हैं तो वर्तमान के प्रसंग भी। लेकिन बावजूद इस रूपक के कि ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘ का ढहना भारत की व्यवस्थाओं का ढहना है यह ढहना ऊपरी मालूम होता है। आख़िरी हिस्से में उसी की तरह दलाली में लगे एक मित्र सुंदरम का कहना -‘हमारा तुम्हारा बिजनेस तो चौपट हो गया मैन ! अब तो लाइसेंस, कोटा सब ख़तम। हमारी तुम्हारी जरूरत किसी को नहीं पड़ेगी।  इण्डिया की सरकार खुद ही दिवालिया हो गई है। विलायत में साठ-सत्तर टन सोना भेज दिया है। वो लोग बोल रहे हैं कि ये लाइसेंस हटाओ। तब हमलोग पैसा देंगे।’ नाकाफी है क्योंकि इसके बाद हुए ‘उदारीकरण’ ने लाइसेन्सराज ख़त्म कर दिया हो लेकिन दलाली किस कदर बढ़ी है यह कौन नहीं जानता? फिर यह भी कि जीवन का जैसा घना चित्र खींचने में उन्होंने पूर्व उपन्यासों में कौशल दिखाया है वह यहाँ नदारद है। आप उपन्यास पढ़कर जयदीप बाबू के प्रति न क्रोध कर पाते हैं न दया।  कोई बात नहीं। यह जरूरी भी नहीं।  लेकिन कोई उपन्यास बगैर किसी बड़े धरातल के बनना मुश्किल होता है। जयदीप की नियति भाग छूटने में है और यही उपन्यास की नियति भी बनकर रह गई है। उपन्यास कुछ अध्यायों में विभक्त है और एक अध्याय का शीर्षक है -क्या पिछला देखा सही देखा था? कहने का मन है – नहीं। यहाँ हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास के सम्बन्ध में दी गई मान्यता याद आती है।बहरहाल रीयल इस्टेट की नकली चमक के बिखरने के साथ उपन्यास ख़त्म होता है और याद रखने लायक जो बचता है वह है -‘इस देश में कोई भी बड़ा से बड़ा चोर,डाकू, लुटेरा,खूनी नहीं है जो आदर्शों की बात न करता हो; जो गांधी,सरदार पटेल, नेहरू या सुभाष बाबू का नाम न लेता हो। शयद उसकी पीढ़ी तक यही चलने वाला है क्योंकि यह मिडनाइट्स चिल्ड्रन की पीढ़ी है। आगे की पीढ़ी को शायद यह सब सोचने या कहने की जरूरत नहीं होगी।’

जानकीदास तेजपाल मैनशन (उपन्यास)

अलका सरावगी
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
400 रुपये

पल्लव

393 डी.डी.ए., ब्लाक सी एंड डी

कनिष्क अपार्टमेन्ट, शालीमार बाग़

नई दिल्ली-110088

मोबाइल  नहीं देना है।

pallavkidak@gmail.com

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