हफ्ते की किताब: ममता कालिया का बाल साहित्य -पल्लव

mamta kaliaहिन्दी में बच्चों और बड़ों के लेखन में बड़ी दूरियां हैं। सामान्यत: हिन्दी के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते। अगर लिखते भी हैं तो उसे अपने मुख्य लेखन के समकक्ष उसे देखना या देखा जाना उन्हें पसन्द नहीं होता। वे इसे क्षतिपूर्ति या भलाई में किये गये काम से ज्यादा नहीं समझते। ऐसे में दिक्कत यह होती है कि मुख्यधारा के बड़े कहे जाने वाले लेखकों की अक्सर कमज़ोर किताबें बच्चों की देखने को मिलती हैं और बच्चों के लेखन के नाम पर ऐसे लेखक काबिज़ रहते हैं जिनका बौद्धिक स्तर चिन्ताजनक है या जो आधुनिकता नाम के विचार से ही अनभिज्ञ हैं। ममता कालिया की इधर कोई छ्ह किताबें आगे पीछे आई हैं जो बच्चों और किशोरों के लिये लिखी गई हैं। ममता कालिया हिन्दी कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में बड़ा नाम हैं। उनकी प्रतिष्ठा ऐसी लेखिका के रूप में है जिनका लेखन मूलत: आसपास के जीवन की विसंगतियों से टकराते हुए बनता है और जो सामाजिकता के विचार को स्वीकारते हुए लेखन में लगातार प्रयोग करती हैं। उनका यह लेखन भी समाजिकता के विचार से जुड़ा है और दुखी-दीन मनुष्यता के संकट यहां भी आ रहे हैं। देखना चाहिए कि उनका ट्रीटमेन्ट किस तरह का है। क्या वे भी भगवान सबका भला करे या जैसी इनके साथ बीती वैसी किसी के साथ न बीते का सनातनी उपदेश दे रही हैं या कुछ और बात भी है?

Kamal ka munnu‘कमाल का है मन्नू’ उनका उपन्यास है जो किशोरों के लिए लिखा गया है और एनसीईआरटी जैसी प्रतिष्ठित संस्था ने इसे प्रकाशित किया है। हिन्दी में बच्चों के लिए फ़िर भी कुछ लिखा जाता है और काम किया जाता है-नंदन,बाल भारती और चकमक इसके प्रमाण हैं लेकिन महान राष्ट्र के निर्माण में लगी सुमन सौरभ के अतिरिक्त किशोरों के लिए कोई पत्रिका हो तो मैं भी जानकर लाभ लेना चाहूंगा। काश जूले बर्न हिन्दी के लेखक होते।

Aisa tha Bajrangi बहरहाल ममता जी के इस उपन्यास के केन्द्र में बोर्ड के इम्तिहान की तैयारी करने वाला किशोर मानस है और उसके कारनामे। मानस को उसकी दादी मन्नू कहती है और यह वाकई कमाल का है। पढने में आलसी और दुनिया भर के गुंताड़ेबाजी में लगा हुआ। कभी रेडियो खोलकर जोड़ देता कभी म्युजिक प्लेयर। और तो और तमाम दुर्घटनाएं भी उसके साथ होती हैं। अच्छी बात यह है कि उसकी दीदी और मम्मी -पापा का भरोसा उस पर है। जब सब डरे हैं की यह फ़ेल हो जाएगा तब वह न केवल फ़र्स्ट डिविजन लाता है बल्कि राज्य भर में उसके वैज्ञानिक माडल को पहला नंबर मिलता है। आशय छिपे नहीं हैं कि अगर हमने इन बिगड़ैल दिख रहे बच्चों पर जरा भी भरोसा किया तो वे बड़े परिणाम दे सकते हैं। यहां मन्नू के दोस्त हैं और गर्ल फ़्रेंड्स भी हैं-वर्जनाओं से मुक्त इस परिवार का मुखिया कालेज का अध्यापक है। क्या वर्जनामुक्त पिता और परिवार के होने से मन्नू की छिपी सम्भावनाएं उजागर हो सकीं? अगर ऐसा है तो यह किताब किशोरों को बच्चा समझने वाले सभी माता-पिताओं को पढ लेनी चाहिए।

बच्चों की किताबों में सबसे पहले है ‘ऐसा था बजरंगी’-बाल लघु उपन्यास, जिसमें एक अनाथ बच्चे बजरंगी की कहानी है उतार चढाव से भरी और दुखी-दीन मनुष्यता के संकट का चित्र दर्शाने वाली। यह एक बच्चे की कहानी है और इसके पाठक भी बच्चे ही होंगे सम्भवत: इसलिए यहां हिंसा और वर्जित बातें नहीं हैं तथापि एक छोटे बच्चे का पिता और मां को खो देना क्या कम करुणापूर्ण है? बजरंगी के रूप में ममता जी एक याद रह जाने वाला चरित्र रचती हैं और उसका हौंसला सलाम करने जैसा है। वह घरेलू काम करते करते प्रेस का काम सीखता है और अंत यह है कि राशन कार्ड में अपना नाम परिवार के साथ देखकर खुशी से भर जाता है। बजरंगी की कहानी क्या कहती है? श्रम का सम्मान! मनुष्यता की जय! बच्चे का हौंसला! शायद सब। असल बात यह है कि ममता कालिया एक ऐसा चरित्र रच पाने में सफ़ल रही हैं जो पाठक को याद रह जाता है। मां की आखिरी निशानी थाली को सुबह बेचकर जब वह शाम को उसे फ़िर खरीदने जाता है तब साहित्य के जानकार पाठकों को महान संघर्षशील चरित्र याद आ सकते हैं। अच्छी बात यह है कि सारे संकट के बावजूद वह महान नहीं है और उसके प्रयत्न सामान्य मनुष्यों के प्रयत्न ही हैं।

Babbu ki bua‘बब्बू की बुआ’ किताब में एक ही कहानी है जो लम्बी है और बब्बू के निम्न वर्गीय जीवन कि कथा कहती है। यहां प्रारम्भ में एक और बच्चा आया है प्रदीप जिसके पास गुल्लक है, जो स्कूल जाता है, जिसकी मम्मी बब्बू को भी हमेशा कोई न कोई चीज़ खाने को देती है। आगे पढने पर पता चलता है कि बब्बू का साधारण परिवार गरीबी का मारा है और इन्हें दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं। ऐसे में बब्बू की बुआ दीवाली मनाने आ जाती है तो बब्बू के परिवार की चिन्ता गहरा जाती है कि अब क्या होगा? यहां इस परिवार को नजदीक से देखना कई पाठकों के लिए नया होगा क्योंकि अब गरीबी का उल्लेख राजनेताओं के भाषणों में भले होता हो टीवी पर गरीब नहीं देखते-न फ़िल्मों में। दवाई की शीशी टूट जाने पर बब्बू की पिटाई होना दुख से भर देता है और तब प्रतीत होता है कि सचमुच गरीबी से बड़ा कोई दुख नहीं।

Shabash Chunnu‘शाबाश चुन्नू’ किताब चुन्नू की कहानी है और उसकी पहली पंक्ति है-‘नन्हा चुन्नू तो बस आफ़त था।’ यह आफ़त लाने वाला बच्चा कभी अपनी आया मैरी को सताता है तो कभी मां को। यहां तक कि नये खरीदे जूतों की मुक्ति अगले ही दिन चाकू से कर देता है। इसकी जिद है स्कूल नहीं जाना। अन्तत: एक दिन धोखे से उसे स्कूल भेज दिया जाता है और देखिये तो उसे धीरे धीरे वहां इतना रस मिलता है कि अब उसे खाना भी मैरी के हाथ का नहीं स्कूल का ही पसन्द है। असल में उसकी उर्जा को स्कूल ने रचनात्मक कार्यों में लगाकर उसे एक अनुशासित विद्यार्थी बना दिया। सवाल यह है कि क्या यह ठीक है? पता नहीं? अगर चुन्नू जैसे बच्चे शाबाशी लेने के लालच में सवाल पूछ्ना बन्द कर देंगे, अगर वे व्यवस्था के लाड़ले बन जाएंगे तो सचमुच बुरी बात होगी।Aisa tha Bajrangi

‘पांच बाल कहानियां’ में कहानियां हैं और इन्हें छोटे बच्चों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। अनुशासन प्रियता, प्रक्रिति और पशु-पक्षियों से प्रेम इन कहानियों के विषय हैं तो स्वतन्त्र व्यक्तित्व की तरफ़ बढ रहे बच्चे इनके पात्र हैं। ‘बन्दर और मोबाइल’ कहानी में शरारती और थोड़ी थोड़ी जिद्दी बूटी की को एक बन्दर सबक सीखाता है तो ’देबू का गुस्सा’ में  मम्मी पापा से रूठ गये देबू को चाची मनाने में सफ़ल होते हैं। ‘नये दोस्त’ में बेटू से मिलने चूज़े आये हैं। ‘निक्की’ रक्षाबंधन की कहानी है जब बहुत खर्च कर रहे और बहुत खुश दिखाई देने की कोशिश कर रहे मामाजीके संकट को निक्की समझ जाती है। ‘बोबो’ की दिशा अपना व्यक्तित्व खुद बनाने की तरफ़ बढ रही है और अपने डाक्टर पापा को साफ़ कहती है-‘मुझे लगता है डाक्टर बहुत बेरहम होते हैं। बीमार आदमी की मजबूरी से वे कमाई करते हैं।’ जब पापा कहते हैं कि बीमारी ठीक भी तो वे ही करते हैं इस पर उसका जवाब है-‘आप ही तो कहते हैं-बहुत सी बीमारियां वक्त के साथ अपने आप ठीक हो जाती हैं। मैं बहस नहीं करना चाहती पर मैं कलाकार बनना चाहती हूं।’ दिशा पर दबाव है कि वह भी डाक्टर बने। संग्रह की कहानियां प्रभावशाली हैं और रोचक भी।

Panch Bal KahaniyaNeh ke Nate‘नेह के नाते’ सामरसेट मॉम के प्रसिद्ध उपन्यास ‘ऑफ ह्यूमन बान्डेज’ का संक्षिप्त रूपान्तरण है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास को नये पाठकों के लिए पढना रोचक होगा क्योंकि यहां एक साधारण आदमी के संघर्ष और उत्थान की कहानी है। ममता कालिया विदेशी परिवेश और वातावरण के बावज़ूद आत्मीय और प्रवाहपूर्ण भाषा से इसकी पुनर्रचना करती हैं। 1915 में छपे इस उपन्यास को हिन्दी के नये पाठकों के लिए उपलब्ध होना वाकई महत्वपूर्ण है।

एक टिप्पणी इन किताबों की सज्जा-चित्रों के बारे में भी की जानी चाहिए। ‘कमाल का है मन्नू’ में जहां अच्छे चित्र और सज्जा है वहीं बाकी की किताबों में सामान्य या औसत। आश्चर्य यह है कि भारतीय ज्ञानपीठ जैसे संस्थान से आने पर भी इनका साज सज्जा का पक्ष कमज़ोर है।

अन्त में कहा जा सकता है कि ममता जी का यह लेखन उनके मुख्य लेखन से कतई भिन्न और दोयम नहीं है क्योंकि यहां भी ममता जी नये जमाने के परिवर्तनों को देख-समझ रही हैं, भिड़ते ही उनकी निन्दा नहीं करतीं। ‘कमाल का है मन्नू’ में परीक्षा के तनाव से गुजरते किशोरों का वर्णन हो या ‘शाबाश चुन्नू’ में नर्सरी के बच्चे का रोज़नामचा पाठक की उत्सुकता रचना में बनी रहे इसमें ममता जी सदैव सफ़ल हैं तो वाजिब सवाल बन सकें इसकी गुंज़ाइश भी वे बनाये रखती हैं। इन रचनाओं में इलाहाबाद बार बार आता है और उसके गली मुहल्ले भी पात्र बनते दिखते हैं। उनकी पीढी के अन्य कथाकार-रचनाकार भी इस तरफ़ आयें और हलचल करें तो बच्चों और किशोरों का साहित्य सम्पन्न ही होगा।

 

‘कमाल का है मन्नू’ मूल्य – 40 रुपये

एनसीईआरटी

श्री अरविन्द मार्ग, नई दिल्ली- 110016

‘ऐसा था बजरंगी’ मूल्य – 40 रुपये

‘बब्बू की बुआ’ मूल्य – 40 रुपये

‘शाबाश चुन्नू’ मूल्य – 40 रुपये

‘पांच बाल कहानियां’ मूल्य – 50 रुपये

‘नेह के नाते’ मूल्य – 40 रुपये

इन सब किताबों के प्रकाशक

भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्ट्टीट्यूशनल एरिया

लोदी रोड,नई दिल्ली- 110003

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