हफ्ते की किताब: ‘श्यामलाल का अकेलापन’ – पल्लव

pallav2[पल्लव बनास जन के संपादक हैं और जाने माने कथा समीक्षक।  हमारे आग्रह पर उन्होंने तय  किया है कि हर सप्ताह अपनी पसन्द की किसी एक नयी-पुरानी किताब पर लिखेंगे। आशा है, आप पसंद करेंगे।

 

वे शुरुआत कर रहे हैं, संजय कुंदन के कहानी संग्रह ‘श्यामलाल का अकेलापन’ से]

‘यह डराना ही तो है। वह कहना चाहता है कि साले हमसे दबकर रहो। तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है क्योंकि तुम सस्ती चीज़ें इस्तेमाल करते हो।’

संजय कुंदन का नया कहानी संग्रह ‘श्यामलाल का अकेलापन’ बन रहे नए समाज की कहानियाँ सुनाता है। यह वह समाज हमने बनाया है जिसमें लोभ, प्रदर्शन प्रियता और इकलखुरापन बढ़ता गया है जिसके कारण मनुष्य एकाकी होता जा रहा है। कभी अस्तित्ववाद जैसे दर्शन ने एलियनेशन की बातें कही थीं और इसे  आधार बनाकर हिन्दी लेखन में कुछ ‘साहित्य रचना’ भी हुई थी। यह अकेलापन उस प्रत्येक मनुष्य का है जो सच्चा है और झूठ -अन्याय का प्रतिकार कर रहा है लेकिन यदि इस अकेलेपन से ग्रस्त होकर वह पलायन का मार्ग चुनता है तो यह विद्रोह नहीं होगा। अच्छा है कि संजय कुंदन के पात्र अपने अकेलेपन में पलायन का रास्ता नहीं खोजते हालांकि वे न बावनदास की तरह शहीद होने का साहस रखते हैं और न उनकी मुट्ठियाँ आखिर में तनी हुई हैं। ये हमारे आसपास के लोग हैं। मद्य वर्ग के लोग। जिनसे समाज में बदलाव हो रहे हैं और बदलाव की पीड़ा भी उन्हें भोगनी पड़ रही है। अच्छी बात यह है कि ये लोग सचेत और सजग होने की कोशिशों में हैं और हो रहे बदलावों को देख-समझ रहे हैं। शीर्षक कहानी ‘श्यामलाल का अकेलापन’ के श्यामलाल का बदलना भला किस मनुष्यता का जय गान नहीं हो सकता ?

संग्रह की शुरुआत जिस कहानी से हुई है वह निम्न मध्य वर्ग के एक पात्र की कहानी है जो एक साथ मीडिया, पुलिस और राजनेताओं के चरित्र को उघाड़ती है। यह वह नया बन गया समाज है जो संबंधों को धन -पद -प्रभाव के आईने में देखने को अभिशप्त है। कहानी नाटकीयता से भरी है और नाटकीयता होने पर भी यथार्थ से कटती नहीं है। बदल रहे समाज और संबंधों की सबसे प्रभावशाली कहानी ‘निवेशक’ है जिसमें न केवल दो पीढ़ियों का द्वंद्व है अपितु यह बदलाव की प्रक्रिया को भी बेहद सूक्ष्म ढंग से बताती है। कहानी फूलन सिंह की है जो गाँव की जमीन बेच कर शहर आ गए हैं और अपने एक सी ए मित्र के सुझाव से यहाँ वहाँ निवेश कर जमापूंजी से अमीर हो जाना चाहते हैं। यही नहीं अपनी मैट्रिक पास बेटी को वे इसलिए कोचिंग सेंटर भेजकर अंग्रेजी सीखा रहे हैं ताकि उसका विवाह एक एनआरआई के बेटे से हो सके। एनआरआई भी ऐसे हैं जो बहू के साथ साथ ‘इण्डिया’ में भरोसेमंद पार्टनर खोज रहे हैं। अर्थात सारे सम्बन्ध धन की लालसा में संचालित हो रहे हैं। इस प्रक्रिया में शामिल छुटभैये जमीनखोर नेता, प्रॉपर्टी ब्रोकर, चिटफंड कम्पनियाँ और आसपास के लोग कहानी में आते गए हैं। होता यह है कि फूलन सिंह काम भर अंग्रेजी ही सिखाने के पक्ष में हैं ताकि कोचिंग पर अधिक धन न बर्बाद हो लेकिन अब बिटिया को आगे पढ़ने की जिद है। इस उलझन में कोचिंग वाला साकेत जब घर आकर उनसे बात  तो उनका गुस्सा है -‘चला आया घर पर बिजनेस बतियाने। साला तेल लगा रहा था हमको। अरे इ लोग को खाली पइसा कमाने से मतलब है। ‘ इस पर उनकी बेटी पूजा का प्रत्युत्तर है -‘और आपको किस चीज़ से मतलब है?’ कहानी का अंत सुखद है जब फूलन सिंह तय कर रहे हैं कि बिटिया आगे पढ़ेगी और वे नौकरी करेंगे। संजय कुंदन जिस धैर्य से इस कहानी का वृत्तांत बुनते हैं वह उनकी कहानी कला का कौशल है। सादगी से भरी भाषा और कहन। कहानी का देसी अंदाज तब भी नयी चिंताएं और नए तनावों से कहानी हमारे समय की सच्चाई कह सकने में समर्थ है। ‘डार्क रूम’ भी वस्तुत: इसी नए दौर के सम्बन्ध का एक्सरे कर रही है। धनञ्जय शर्मा ने अपने पिता में रूखापन और सामंती हेकड़ी देखी थी जो उनसे अपने बच्चों को दूर रखती थी यही कारण था कि वे ऐसे पिता बने जो उदार है,जिनसे बच्चा ‘आप’ नहीं ‘तुम’ कहकर बात करता है और जो अपने को बच्चे का बाप नहीं दोस्त मानते हैं। फिर भी क्या कारण है कि युवा हो रहा उनका बेटा उनसे दूर है ? कहाँ चूक हुई ? पिता – पुत्र संबंधों पर हिंदी में अनेक शानदार कहानियाँ हैं और कहना न होगा कि यह कहानी भी उनमें शामिल होने की हैसियत रखती हैं।

shyamlalkaakelapanइस नयी समाज व्यवस्था में नए ढंग के जो लोग आ रहे हैं -बन रहे हैं, उनका जीवन कैसा है ? वे क्या सोचते हैं ? संजय की निगाह में यह बात है। वे एक ऑटो रिक्शा चलाने वाले की जिंदगी पहली ही कहानी में दिखाते हैं तो इधर पुलिस और पालतू गुंडों के नए सभ्य अवतार ‘बाउंसर’ से भी पाठकों को रूबरू करवाते हैं। कथावाचक के गाँव का एक बचपन का मित्र मोटा हो गया है और खाली है। इतना खाली कि घरवाले भी उससे छोटे का विवाह कर चुके हैं। जब यह बाउंसर की नौकरी करने शहर आ गया है तब इसका हाल दर्शनीय है। इसके हाल के बहाने संजय कुंदन असल में बता रहे हैं कि इस नए दौर में शानदार दफ्तरों में खूब कमाई कर रहे लोग कितनी सुरक्षा में हैं और यह कैसा समाज है जहाँ हर कोई एक दूसरे से डरा हुआ है और इसलिए हर कोई अकेला है। शायद यही विखंडन होता हो और इसी को उत्तर आधुनिकता कहा जाता हो। भारत जैसे देश में यह नया बन रहा समाज कितना विषम और भयानक है इसकी झलक ‘डार्क रूम’ के साथ ‘अगला जनम’, ‘महानगर के किस्से’ और ‘हेलीकॉप्टर वाले भइया’ में भी देखी जा सकती है। ‘अगला जनम’ संजय की शैली की कहानी नहीं है यह चकित करने वाली कहानी है जिसमें इस नए दौर में भी कोई जोखिम ले सकता है, भय के बावजूद बदतमीजी कर सकता है फिर चाहे जो हो। ‘महानगर के किस्से’में कामकाजी, पैसे के लिए पत्थर-मूर्ति बना युवक, दलाल, एक दम्पति और एक पत्रकार के किस्से हैं जो छोटे छोटे और अलग अलग होकर भी अपनी प्रकृति में अभिन्न हैं। यह अभिन्नता महानगरों की कठोरता और अकरूणा से बन रही है। क्या इन्हें एक नहीं हो जाना चाहिए जबकि इनके दुख साझे हैं। संजय कुंदन इस संभावना को जगाते हैं और पाठक अपनी नियति देखने को विवश होता है।

जैसा कि संग्रह की पहली कहानी ‘हीरो’ की चर्चा में उल्लेख हुआ है कि यह मीडिया के चरित्र को दिखाती है ठीक इसी विषय से जुड़ती एक और कहानी संग्रह में है ‘रैली’, जो एकलखुरे होने में सुख लेने वाले पत्रकार की कथा है। आखिर इस शक्तिशाली व्यवस्था ने अपने मुलाजिमों को सुख-सुविधाएं दी हैं भले उसका उद्देश्य अपने इन मुलाजिमों को पालतू और वफादार बनाना ही क्यों न हो?  ‘रैली’ इस विडम्बना को दर्शाती है जब कंडीशंड हो चुका एक पत्रकार अपने मन का काम मिलने पर भी उसे करने में असमर्थ है। ‘हीरो’ में अॉटो रिक्शा में बैठे युवा पत्रकार इसी रास्ते पर हैं तब भी उन्हें सच्चाई का पता है। यह बात संजय के पात्र जानते हैं और वे परिपक्व हो रहे पात्र हैं जो अपनी नियति देख-पहचान सकते हैं। ‘हीरो’  का अॉटो रिक्शा चालक चन्दर जान गया है कि टीवी पर चेहरा आ जाने से हीरो ही नहीं बनते-जान भी जा सकती है।

संग्रह की आख़िरी दोनों कहानियां स्त्री जीवन की कहानियाँ हैं। ‘टैगोर वाटिका’ जहाँ स्त्री के संघर्ष की देखी-जानी कहानी है वहीं ‘मेरा मोहल्ला जिंदाबाद’ अंतत: स्त्री-पुरुष संबंधों के जड़ सामंती दृष्टिकोण का चित्र है। ‘टैगोर वाटिका’ जैसी कहानी संजय कुंदन के संग्रह में होना विस्मित करता है सम्भव है वे विमर्श के पैरोकारों को बताना चाहते हों कि लीजिये कहानी ऐसे भी लिखी जा सकती है लेकिन यह अपनी प्रतिभा के साथ अन्याय ही है। आंशिक प्रसंग के बावजूद ‘मेरा मोहल्ला जिंदाबाद’ पुराने संस्कारों की जड़ता और मोहल्लावाद के आत्मीय नारों के बीच बैठे कलुष को उजागर करती है।यह कलुष स्त्री को उपभोग की वस्तु मानने से उपज रहा है।

कहानी के क्षेत्र में इधर हो रहे नवाचारों और प्रयोगों के बीच संजय कुंदन के कहानीकार का होना आश्वस्तिप्रद है। वे बदलाव को देख-समझ रहे हैं और सामूहिकता के लोप होने की चिंता भी उनके भीतर है। सही प्रतिरोध के लिए भीतर की छटपटाहट को ठीक ठीक अभिव्यक्ति देने का कौशल संजय कुंदन की कहानियों में है। वे हमारे दौर की आकाश छूने वाली कामनाओं को जानते हैं और उन कामनाओं को पूरा करने के कारण होने वाले शोषण को बताते हैं और इन कामनाओं के पूरा न हो पाने के त्रास को भी मार्मिक अभिव्यक्ति देते हैं। उनकी कहानी का अंश है-‘मैं देखने लग जाता हूँ बैजू भइया को औंधे मुंह गिरते हुए,आकाश और जमीन के बीच ही कहीं गायब होते हुए।’

संजय कुंदन, ‘श्यामलाल का अकेलापन’ 

किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली 

मूल्य 300 /- 

 

pallavkidak@gmail.com

 

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