साम्राज्यवादी हिंदी का प्रश्न और दूसरी भाषाएँ: अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

arimardan kumar tripathiआम तौर पर किसी भाषा का विकास एवं विस्तार उसके समाज के साथ होता है, लेकिन हिंदी के संदर्भ में यह तथ्य शतांश सत्य नहीं है। हिंदी का विकास जिस खड़ी बोली से हो रहा था एवं इधर महात्मा गांधी जिस ‘हिंदुस्तानी’ की बात कर रहे थे, उन दोनों हिंदी के दो अलग लक्ष्य थे। हिंदी नवजागरण हो सकता है है कि ‘खड़ी बोली हिंदी’ के पीछे रहा हो, जो हिंदी के विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया थी, लेकिन ‘हिंदुस्तानी’ एक राजनीतिक महत्त्वाकांक्षी की भाषा थी, जो लोक-संघर्ष की अखिल भारतीय पहचान के उद्देश्य से सायास प्रायोजित थी। गौरतलब है कि हिंदी के नियोजन-प्रक्रिया की अखिल भारतीय भूमिका थी। हालाँकि स्वतंत्रता-आंदोलन में ‘खड़ी बोली हिंदी’ के अनेक लेखक एवं पत्रकार अपनी रचनात्मकता के साथ शामिल थे, लेकिन इन सब को अंतत: ‘हिंदुस्तानी’ के भाव की छत्र-छाया में ही अपना स्थान खोजना था। ऐसे में ‘हिंदुस्तानी’ सिर्फ भाषा नहीं थी, बल्कि एक अखिल भारतीयता की सोच थी, एक राजनीतिक प्रक्रिया थी एवं एक उद्देश्यगत भाषाई प्रारूप थी। इसकी भाषाई अस्मिता सामूहिक थी, जो अपने मिश्रित भाषाई रूप से आगे एक राष्ट्र के साथ खड़ी होती थी, जिसमें उप-राष्ट्रीयता के अनेक कारक जैसे- भाषा, संस्कृति, धर्म, क्षेत्र एवं जाति आदि शामिल होते थे।

गौरतलब है कि आज भी मुखर अस्तित्व में हिंदी अपने उसी रूप में है, जिसका कोई अपना विशेष भूगोल नहीं है। देश के जिन प्रदेशों को हिंदी-पट्टी के रूप रूढ़ कर दिया गया है, वहाँ की स्थानीय भाषाएँ आज क्षेत्रीय अस्मिता की भाषाएँ हैं न कि हिंदी। अवधी, भोजपूरी, राजस्थानी, बुंदेली, बघेली, हरियाणवी, गढ़वाली एवं मगही जैसी 49 से अधिक भाषाएँ लिखित या अलिखित, साहित्य की उपलब्धता या अनुपलब्धता के बावजूद अपने स्थानीयता की प्रतीक हैं। यहाँ के लोग इन भाषाओं को वैसे ही चाहते हैं, जैसे तमिल, तेलुगु, बांग्ला, उड़िया आदि के लोग अपनी भाषाओं को चाहते हैं। यह कदाचित स्वतंत्रता-संघर्ष की उस भावना का विस्तार ही है, जो अखिल भारतीयता की सोच के आगे अपने स्थानीय हितों का परित्याग करती हो। बहरहाल सरकारी तौर पर समझने का अंतर यह है कि जैसे हिंदीतर क्षेत्रों के लोग अपनी भाषाओं को शास्त्रीयता के दर्जे पाने से खुश हो रहे हैं, वैसे ही इस कथित हिंदी-पट्टी में लोग अपनी भाषाओं को संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के नाम पर होने वाले आंदोलनों एवं अभियानों से सहानुभूति रखते हैं। अब यह सत्ताई व्यवस्था है कि देश की भाषाई अस्मिताओं को तुष्ट इसे शास्त्रीयता का दर्जे देकर करती है या आठवीं अनुसूची में शामिल करके। क्योंकि  आम जनता के लिए तो ये आत्मसम्मान की माध्यम मात्र हैं। भाषाई धरातल पर एक बड़ा अंतर यह है कि हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में हिंदी ऐसी द्वितीय भाषा है, जिस पर आज संदेह हो रहा है और कथित हिंदी क्षेत्रों में हिंदी को प्रथम भाषा जैसी आत्म-स्वीकृति मिली हुई है। दूसरे शब्दों में यूं कहें कि यहाँ लोग राष्ट्रीय आवरण में पहले एकीकृत होते हैं और स्थानीय अस्मिता के रूप इनके लिए गौण ही रहे हैं।

‘न्गुगी वा थ्योंगो’ ने भाषा को व्याख्यायित करते हुए बताया था कि “भाषा की दोहरी भूमिका होती है, प्रथम तो संपर्क के माध्यम के रूप में, द्वितीय संस्कृति की संवाहिका के रूप में।” आगे वे अँग्रेजी के उदाहरण से समझाते हैं कि अँग्रेजी ब्रिटेन व स्वीडेन तथा डेनमार्क में बोली जाती है। लेकिन स्वीडेन एवं डेनमार्क के लोगों के लिए गैर-स्वीडिश एवं गैर-डेनिश भाषाई लोगों के साथ संपर्क का माध्यम मात्र है, जबकि ब्रिटेन के लोगों के लिए अँग्रेजी न सिर्फ संपर्क की भाषा है, बल्कि ब्रिटिश संस्कृति एवं इतिहास की मूल संवाहिका भी है। दरअसल एक भाषा के रूप में हिंदी का मुख्य कर्म संपर्क-भाषा का ही रहा है, जबकि मूल सांस्कृतिक धरोहर के नाम पर यह अपेक्षाकृत दरिद्र ही रही है। ध्यान रहे किसी भाषा का अंतर-सांस्कृतिक वर्चस्व अपने मूल सांस्कृतिक थाती के बल पर ही हो सकता है। इसलिए देश में बड़ी तेजी से हो रहे या सायास कराए जा रहे इस दुष्प्रचार से किसी को भयाक्रांत होने की कोई ठोस वजह नहीं दिख रही है कि हिंदी भाषा साम्राज्यवादी रूप में आगे बढ़ रही है। हाँ एक बात स्वीकार किया जाना चाहिए कि देश में किसी भी दूसरी भाषाओं से कई गुना अधिक हिंदी को बाजार का संरक्षण है। इसमें भी भाषा की कोई निर्णायक भूमिका नहीं है, बल्कि इसके बोलने वाली आबादी की संख्या को बाजार अपने उपभोक्ता के रूप में देखता है। यहाँ यदि किसी भी रूप में मान भी लें कि हिंदी-भाषी कोई वर्ग अस्तित्व में है तो ध्यान रहे कि इसका बहुसंख्य आबादी हर तरह की सत्ताओं से शोषित और दमित रही है। यह वही आबादी है जो देश के विभिन्न महानगरों में मजदूरी और छोटे-मोटे व्यवसाय करके जीवन-यापन को मजबूर है। अब कोई मजबूर तबका साम्राज्यवादी नहीं हो सकता और इसके साम्राज्य की भाषा हिंदी तो कदापि नहीं हो सकती, क्योंकि मूल से विस्थापित इस आबादी के लिए हिंदी डांट-फटकार सुनने की भाषा मात्र है। यहाँ यदि हिंदी और इनकी स्थानीय भाषाओं के मध्य जो संबंध बनता है, तो वह मालिक और नौकर का ही है। इस पूरे प्रकरण में हिंदी न्गुगी वा थ्योंगो के उस अँग्रेजी की ही तरह है, जो स्वीडेन और डेनमार्क में बोली जाती थी।

यह बहुस्वीकार्य तथ्य है कि हिंदी के विस्तार में फिल्मों का बहुत बड़ा योगदान है, जो काफी हद तक सही भी है। इधर सेटेलाइट प्रसारण की व्यवस्था के बाद सामान्य कथानक की हिंदी फिल्म को भी चंद दिनों में सौ करोड़ का व्यवसाय करना, आम बात हो गई है। अब इतने बड़े उद्योग की भी कथित हिंदी-पट्टी की सहभागिता उस मायने में कतई नहीं है, जितना प्रथम दृष्टया लगता है। गीत, संगीत, अभिनय, वीडियो संपादन, कैमरा आदि से जुड़े आंतरिक क्षेत्रों में भी पूरे देश की मिश्रित आबादी की सहभागिता सहज मिल जाती है। इस पूरे संदर्भ में सिने तारिका कंगना रानाउत के हाल के उस बयान को भी देखा जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘मुंबई में एक सवाल किया जाता है कि अँग्रेजी-ज्ञान के बिना हिंदी फिल्मों में काम करना कैसे संभव है?’ इस प्रकार हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय उत्पाद यानि हिंदी फिल्मों के उद्योग में भी हिंदी सिर्फ पूँजी बनाने का एक माध्यम है।  इस क्रम में बाजार की जो सत्ता बन रही है, उससे सबसे अधिक शोषित भी वही समूह है, जिसने अपने स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा करके हिंदी-भाषी के रूप में स्वयं को एकीकृत किया है। हालाँकि हिंदी-फिल्मों का बाजार न सिर्फ अखिल भारतीय बल्कि वैश्विक है, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि विश्व-व्यापी हिंदीतर क्षेत्रों में मनोरंजन के साधन के रूप में हिंदी फिल्मों की उपस्थिति वैकल्पिक है, जबकि हिंदी के इस एकीकृत क्षेत्र में यह अनिवार्य है।

देश में हिंदी-भाषी संख्या के रूप में सरकारी आँकलन विशेषकर जनसंख्या आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए 41 प्रतिशत का आँकड़ा भी कोई ठोस तथ्य नहीं है, क्योंकि जनसंख्या आयोग की कार्य-पद्धति में प्राय: भाषा कोई जबाबदेही का विषय नहीं है, दूसरे जिन क्षेत्रों को सामान्यत: हिंदी मातृभाषी आबादी के रूप दिखाया जाता है, वहाँ के लोगों में अपनी मूल मातृभाषाओं के प्रति विशेष जागरूकता नहीं है कि मुखरता से अपनी स्थानीय भाषाओं के पक्ष में जनसंख्या आयोग के प्रतिनिधियों से अपनी बात रख सकें। संभव है कि आगे के अध्ययनों में देश के अंदर हिंदी बोलने वालों की संख्या अधिक हो, लेकिन यह द्वितीय भाषा या संपर्क-भाषा के रूप में होगी। यहाँ किसी संपर्क-भाषा के चरित्र को अफ्रीकी लेखक चिनुआ अचेबे के उस वक्तव्य से समझना होगा, जिसमें वे कहते हैं कि “मुझे लगता है कि अँग्रेजी मेरे अफ्रीकी अनुभवों की संवाहिका होगी, लेकिन उसके लिए उसे एक नई अँग्रेजी बननी पड़ेगी। संभव है कि यह नई अँग्रेजी अपने आनुवांशिकता की विस्तार हो, लेकिन अंतत: इसे अफ्रीकी परिवेश के अनुकूल ही रहना होगा।” ध्यान रहे कि अँग्रेजी की अपनी ठोस जमीन रही है और इसका विस्तार ऐसे अभिजात शासक-वर्ग की भाषा के रूप में था, जिनका मूल उद्देश्य ही औपनिवेशिक विस्तार था, जबकि इसके विपरीत हिंदी हमेशा सर्वहारा की भाषा रही है और किसी भी रूप में सत्ता की भाषा नहीं रही है। आज भी इसमें अरबी, फारसी एवं अँग्रेजी जैसी कभी सत्ताई भाषाओं के शब्द इसलिए मिल जाते हैं कि हिंदी इनसे शासित रही है। हिंदी के भाषिक योजना के सर्वाधिक जिम्मेदार पक्ष आम आबादी होती है, जिसने आंध्रप्रदेश सहित दक्षिण भारत में ‘दक्खिनी हिंदी’ बनाया था, मुंबई में ‘मुंबइया हिंदी’ तो बिहार में ‘बिहारी हिंदी’। इस क्रम में अनेक दूसरे क्षेत्रों में भी हिंदी स्थानीयता की ढाल में ढलकर ही वहाँ ठहर पाई है। दरअसल भाषा मूल में लोकतांत्रिक होती है। जो भाषा अपने लोक से कटी, उसका अस्तित्व समाप्त हो जाना स्वाभाविक है। भारत में संस्कृत जैसी समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा भी आज संग्रहालय की भाषा होने के कगार पर है। यह स्थिति ग्रीक और लैटिन जैसी भाषाओं के साथ भी रही है। इससे इतर हिंदी का सबसे सबल पक्ष इसका लोक से न कटना रहा है। बहुभाषी देश में विभिन्न भाषाई क्षेत्रों में हिंदी के अपने रूप हैं, आज भी लोकापेक्षी ही है।

हाँ, इधर जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक भाषणों को मीडिया ने रिपोर्टिंग की है, उससे हिंदी के साम्राज्यवादी होने का अनायास ही भ्रम बन जाता है। जो सही नहीं है। सच्चाई यह है कि जिस समुदाय को वे संबोधित करते हैं, वे पहले से वहाँ हैं और मोदी जी के वहाँ से वापस आने के बाद भी वहीं रहेंगे और जाहिर है कि वे भारतीय मूल के लोग हैं तो उनके आपसी संवाद की भाषाओं में से एक हिंदी भी होती होगी। वैसे भी किसी भाषा का विकास या विस्तार महज इसलिए नहीं हो सकता कि उसके प्रधानमंत्री अपने विदेशी दौरों में हिंदी का प्रयोग करता है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस भाषा के प्रयोग-क्षेत्रों का कितना विकास हुआ है, उसमें उपलब्ध साहित्य की मात्रा एवं गुणवत्ता कैसी है? अब यह किसी से छिपा नहीं है कि हिंदी इस मामले में कमजोर है और सीमित प्रयोग-क्षेत्रों तक ही सीमित है आज भी इसे अपने अंतर्वस्तु को लेकर बहुधा प्रसंगों में अँग्रेजी की ओर देखना पड़ता है। इधर जिस प्रकार यह बाजार के कंधे पर सवार हो रही है, उससे इसके आंतरिक स्थानीय चेतनाओं की अभिव्यक्ति को सबसे अधिक खतरा है, क्योंकि किसी लोकतांत्रिक सरकार और बाजार का भाषाई प्रेम इसकी संख्या बल पर निर्भर करता है, जो वास्तव में एक कामचलाऊ उपक्रम होता है। इससे हिंदी का जो विकास हो पाता है, वह प्रत्युत्पाद के रूप में। प्रत्युत्पाद वाला विकास स्थाई नहीं हो सकता। हिंदी के लिए यदि कुछ स्थाई रहा है, तो इसका कामचलाऊ रूप में उपयोग की प्रवृत्ति। इससे इतर तो यह हमेशा से सत्ताई उपेक्षा, दोहन और एक तबके की घृणा की भाषा रही है। लेकिन इन सबके बीच इसका सबसे मजबूत पक्ष यह है कि इसने कभी अपनी ओर से अभिजातीय चरित्र पर दावा नहीं किया है और आमजन के दु:ख-दर्द से रूबरू रही है। कोई भाषा किसी बहुभाषिक परिक्षेत्र में जब तक आमजन के दु:ख-दर्द को अभिव्यक्त करती रहेगी, स्थानीय भाषाओं की सहचरी बनी रहेगी, तब तक साम्राज्यवादी हो ही नहीं सकती।

arimardankt@gmail.com

(जनसत्ता, 01.11.15)

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