औपनिवेशिक सत्ता की भाषा नीति और हिंदी-उर्दू विवाद: गणपत तेली

शुरू में अपने अकादमिक साधनों से अंग्रेजों ने भारत को असभ्य और जड़ बताया और उसे सभ्य बनाने के कार्य का श्रेय लिया। सभ्यता के इस मिशन में उन्होंने भारत के सामाजिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सुधार कार्य भी किये। ब्रिटिश शासन के इन हस्तक्षेपों का भारतीय समाज की प्रतिगामी ताकतों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था, जिसके कारण ब्रिटिश शासन ने आगे यह हस्तक्षेप करना बंद कर दिया था। इसके बाद वो उतना ही हस्तक्षेप करते थे, जितना उनके बने रहने के लिए आवश्यक होता था। यह स्थिति अन्य उपनिवशों से अलग हो गई थी। अंग्रेजों ने ही अन्य उपनिवेशों में और अन्य उपनिवेशवादी देशों ने अपने उपनिवेशों में इस नीति को जारी रखा था।

अपनी नीति के अनुसार भारत में अंग्रेजों ने बाद में सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया। आवश्यक होने पर उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप किये थे। लेकिन उनके राजनीतिक दायरे में जो क्षेत्र आ रहे थे, उनमें वे हस्तक्षेप करते रहे। उस समय भाषा का सवाल सामाजिक-सांस्कृतिक, अकादमिक होने के साथ-साथ राजनीति और आर्थिक सवाल भी था। इसलिए भाषा के सवाल पर अंग्रेज अपनी चाल चलते रहे। वैसे उन्होंने प्रारंभ में हिन्दी-उर्दू का अकादमिक विभाजन कर उसे प्रशासनिक क्षेत्रों में लागू किया और हिन्दी-उर्दू के समर्थकों को धार्मिक लाइन पर ऐसा लड़ाना प्रारंभ किया कि आगे उन्हें उसे हवा देते रहने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ा।

उपनिवेशवाद की स्थापना के लिए जब भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनियों का आगमन हुआ, इन कंपनियों में लंबे समय तक आपसी संघर्ष चला। इस संघर्ष में अंततः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सपफलता मिली। इस सफलता के साथ ही ईस्ट इंडियां कम्पनी ने व्यापार के साथ-साथ राज्य स्थापना की ओर रूख किया। यहां के शासकों को परास्त कर यहां राज्य स्थापना तो ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कर ली, लेकिन लंबे समय तक टिके रहने, यहां शासन करने और शोषण को निरंतर रखने के लिए इतना पर्याप्त नहीं था। किसी के भी लिए शासन स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि वह वहां के मानव-व्यवहारों से परिचित हो, वहां के इतिहास, भूगोल, अर्थव्यवस्था, भाषा, संस्कृति आदि से परिचित हो। ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रबंध्कों को भी यह आवश्यकता महसूस हुई। लेकिन भारत की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विविधताओं के कारण उनकी समस्याएं अधिक जटिल हो गई।

यहां शासन स्थापित होने के बाद अंग्रेजों ने विविध क्षेत्रों में भारत संबंधी अध्ययन प्रारंभ किए। पुरातत्व, इतिहास आदि इनमें प्रमुख थे। इन अध्ययनों में प्राच्यवादी दृष्टिकोण से ही अधिकांश अध्ययन हुए थे। इसी क्रम में उन्होंने पहली बार भारत का भाषा सर्वेक्षण, भारत की जनगणना आदि के जरिए यहां के समाज को बेहतर तरीके से जानने की कोशिश की ताकि वे उसके अनुरूप नीतियां बनाकर यहां ढंग से शासन कर सके। अपनी नीतियों में उन्होंने भारत की इस विविधता के आधार पर अपने शासन की नीतियां बनाई। भारत की इस विविधता का इस्तेमाल उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की कुख्यात नीति अपनाने के लिए किया।

भारत में खासकर उत्तर भारत में उनके लिए हिंदू और मुसलमान दो समुदाय ऐसे थे, जिनके अंतरों को उत्तेजित कर उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर सकते थे। इससे पहले वे यहां के देशी राजाओं को ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाकर अपना राज्य स्थापित कर चुके थे। राज्य स्थापित होने के बाद भी उन्हें यहां की जनता की एकता से खतरा था। 1857 में उन्होंने इस बात को भांप लिया था। उन्होंने विभिन्न तरीकों से  दोनों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया। पहले उन्हें मुसलमानों से ज्यादा असुरक्षा लगी, इसलिए उन्होंने हिंदुओं का पक्ष लिया, बाद के वर्षों में उन्होंने मुसलमानों का पक्ष लेना प्रारंभ किया। यह पक्ष लेना सिर्फ इन समुदायों के नेताओं को अपने पक्ष में कर लेना था। इससे पफायदा अंग्रेजों के अलावा यदि किसी और को था, तो उन नेताओं को ही था। हिंदुओं और मुसलमानों के इन अंतरों को उकसाने में उनके अन्य तरीकों के साथ-साथ भाषा भी एक महत्त्वपूर्ण हथियार बनी। नागरी और फारसी लिपि के आधार पर हिंदुस्तानी के हिन्दी और उर्दू स्वरूप के अंतरों को उभार कर उन्होंने 1857 में कमो-बेश एक रहे इन दोनों समुदायों को अलग-अलग कर एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया और ऐसा खड़ा किया कि वे बरसों तक और कमो-बेश आज भी वैसे ही खड़े हैं।

औपनिवेशिक भारत में उपनिवेशवाद के प्रभाव से आए बदलावों और सामाजिक संरचनाओं में आ रहे बदलाव पर बात करते हुए इतिहासकार के.एन. पणिक्कर ने लिखा है कि “हिंदुओं के धार्मिक एकीकरण के पीछे उपनिवेशवाद ने एक महत्त्वपूर्ण उत्प्रेरक का काम किया। सामाजिक पुनर्रचना एवं सांस्कृतिक आधिपत्य के लिए उपनिवेशवाद ने जो प्रयास किए उसके परिणामस्वरूप हिन्दुओं में एक सामुदायिक चेतना जागृत हो गई। सामाजिक एवं धार्मिक आचरणों में उपनिवेशवादियों के हस्तक्षेप से एक सांस्कृतिक असंतोष पनपने लगा। सामाजिक परिवर्तन के संबंध समान दृष्टिकोण के अभाव के बावजूद यह असंतोष पूरे हिन्दू समाज में व्याप्त था। इस क्रम में उछलकर सामने आने वाले मुद्दों पर समान धार्मिक मुहावरों में वाद-विवाद होता था।” औपनिवेशिक शासन ने इन मुद्दों को धार्मिक आधरों पर विभाजित कर दिया और जो विभाजन पहले से चले आ रहे थे, उनको स्थापित करवा लिया था। औपनिवेशिक हस्तक्षेप से विकसित हुई इस धारा का प्रभाव बताते हुए पणिक्कर ने आगे लिखा है कि “हिन्दू पुनर्जागरण पुनर्रचना एवं आंतरिक संगठन से कहीं अधिक साबित हुआ। हिन्दी-उर्दू विवाद, गोरक्षा आंदोलन, राजनीतिक आन्दोलन के लिए धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग और इन सबसे ऊपर छिट-पुट साम्प्रदायिक दंगे- एक के बाद एक घटना विकास ने ऐसे नजरिए को और मजबूत किया।”

अंग्रेजों द्वारा प्रशासनिक स्तर पर किए जा रहे विभाजनकारी कार्यों को भी दोनों समुदायों के नेताओं ने हाथों-हाथ लिया। भाषा संबंधी इस विभाजनकार्य में भी यही हुआ। इस संबंध में आशा सारंगी ने लिखा कि “उन्नीसवीं सदी से औपनिवेशिक राज्य और भारतीय राष्ट्रवादियों दोनों ने सर्वे और गणना संबंधी विमर्शों और कार्यों को सामाजिक समुदायों की भाषाई पहचान की सीमाओं और इनके राजनीतिक उत्पादों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया।” इन विमर्शों और कार्यों में अंग्रेजों द्वारा स्थापित किए गए शिक्षा संस्थान, पाठ्यक्रम, सर्वेक्षण, गजट, जनगणना आदि प्रमुख हैं। आशा सांरगी के अनुसार “भाषाई पहचान की राजनीति और सांस्कृतिक-राजनीतिक समुदाय के रूप में समुदाय निर्माण इन सर्वें और गणनात्मक कार्यों से बहुत प्रभावित हुई थीं। हिन्दी और उर्दू अब केवल दो अलग भाषाई शैलियां न रह कर हिन्दुओं और मुसलमानों अलग पहचान वाली सामाजिक समुदाय बन चुकी थीं।”

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना प्रशासन प्रभावी तरीके से चलाने और अपना प्रभुत्व स्थापित करने के उद्देश्य से यहां एक शिक्षण संस्था की जरूरत महसूस की। थॉमस रोबक द्वारा संकलित एनाल्स ऑफ दी कॉलेज ऑफ दी फॉर्ट विलियम में बंगाल में एक कॉलेज की स्थापना के कारणों को स्पष्ट करने वाले फॉर्ट विलियम कॉलेज की परिषद के मिनट्स दिए हुए हैं। उनमें 18 अगस्त 1800 को यह स्पष्ट किया गया है कि भारत में अच्छे शासन और ब्रिटिश साम्राज्य की स्थिरता के लिए एक संस्थान, और अनुशासन, शिक्षा और अध्ययन की व्यवस्था की जरूरत है। इसी जरूरत के मद्देनजर कंपनी के कनिष्ठ नागरिक सेवकों के बेहतर प्रशिक्षण के लिए बंगाल के फॉर्ट विलियम में एक कॉलेज की स्थापना की गई। सरकार के विभिन्न प्रशासनिक विभागों के कार्यालयों में अपनी ड्यूटी देने के लिए उन्हें इस कॉलेज की साहित्य, विज्ञान और ज्ञान जैसी शाखाओं में पारंगत किया जा सकता है। इसी फॉर्ट विलियम कॉलेज से हिन्दी और उर्दू का भेद स्थापित हुआ, वह भी ब्रिटिश साम्राज्य को स्थिर रखने की दिशा में ही किया गया प्रयास था। भाषा का यह भेद अन्य भेदों के साथ मिलकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अलगाव लाने वाला बना और इसी तरह से अंग्रेज ‘फुट डालो और राज करो’ की अपनी नीति इस क्षेत्र में भी लागू करने की दिशा में सपफल हुए। हालांकि यह बात स्पष्ट है कि फॉर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के दौरान संचालकों या कंपनी सरकार के मन में यह योजना नहीं थी, गिलक्रिस्ट ही इस नतीजे पर पहुंचे थे।

भाषा शास्त्री जॉन बार्थविक गिलक्रिस्ट उस समय ईस्ट इंडिया कम्पनी के नव-नियुक्त अधिकारियों को हिन्दुस्तानी सीखाने के लिए एक पाठ्यचर्या बनाने का काम कर रहे थे। वे हिंदुस्तानी के प्रोपफेसर नियुक्त किये गये, जहां उनको भारतीय शोधकर्ताओं और अनुवादकों का निरीक्षण और निर्देशन करना था। यहीं पर पहली बार हिन्दी और उर्दू का भेद स्पष्ट माना गया और हिन्दी के संस्कृतकरण का पहला प्रयास प्रारंभ हुआ। औपनिवेशिक ताकतों द्वारा यह प्रयास भारत में ‘फूट डालो, राज करो’ नीति का हिस्सा तो था ही, उससे अलग अकादमिक स्तर पर उपनिवेशवादी मानसिकता में ही बहुत से काम किए गए थे।

हिन्दी और उर्दू विवाद को पैदा करने में अंग्रेजी उपनिवेशवाद की केवल यह भूमिका नहीं है कि उस समय राष्ट्र या राष्ट्र-राज्य के विचार यहां आए और इस आधार पर यहां हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने क्रमशः हिन्दी और उर्दू को खुद को राष्ट्र घोषित करने में सहारे के रूप में इस्तेमाल किया। यह तो एक प्रक्रिया में हुआ ही था, लेकिन उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा संस्थागत रूप से हिन्दी और उर्दू का विभाजन किया गया। आगे मैक्डॉनल द्वारा यह भूमिका निभाये जाने से पहले गिलक्रिस्ट ने अपने अनुमानों और पूर्वाग्रहों के आधार पर फारसीनिष्ठ भाषा की जगह संस्कृत के शब्दों से युक्त हिन्दी को मान्यता दी और उध्र फारसीनिष्ठ शब्दों से युक्त फारसी लिपि में उर्दू को बनाया। यह पहली बार था कि हिन्दी और उर्दू को इस तरह अलग-अलग भाषाओं की तरह संस्थागत वैधता प्राप्त हुई।

 इसके अतिरिक्त एक अन्य कार्य मिशनरियों द्वारा किया गया। सीधे सत्ता वर्ग के न होने के बावजूद इनके प्रयास भी प्रायः उपनिवेशवादी एजेण्डे के तहत ही होते थे, जिसमें पूर्व को ‘सभ्य’ बनाया जाना था। इन मिशनरियों को अपने स्कूलों के लिए पाठ्यपुस्तकों की आवश्यकता हो रही थी, जाहिर सी बात है पश्चिमोत्तर प्रांत और बंगाल की पुस्तकें वर्नाकुलर में ही तैयार होनी थीं। इस काम के लिए उन्होंने विभिन्न धार्मिक समुदाय के मुखियाओं से संपर्क किया। इन मुखियाओं ने अपने-अपने समुदाय को हिन्दी और उर्दू से संबंधित बताया। इस तरह से भाषा और समुदाय को आपस में जोड़कर देखने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। जाहिर सी बात है कि इस तरह जो पाठ्यपुस्तकें बनीं, उनकी भाषा भी फारसीनिष्ठ उर्दू और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी ही रही। भाषा-विवाद के इस मसले पर मिशनरियों और पाठ्यपुस्तक लेखकों का योगदान भी ब्रिटिश शासन के समान ही रहा।  इसी संबंध में प्रोफेसर राजनाथ पांडे ने लिखा कि “हिन्दी और उर्दू दोनों का स्वरूप पहिले अधिक सरल और जन साधारण के लिए ग्राह्य था। किंतु अंग्रेजी शासन के उत्तरोत्तर फैलाव तथा सुदृढ़ संगठन के समय से इन दोनों भाषाओं का दृष्टिकोण अधिकाधिक पश्चिमीय होता गया और आज हिन्दी और उर्दू का एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न अस्तित्व, दृष्टिकोण और भविष्य है।” दोनों भाषाओं के अस्तित्व, दृष्टिकोण और भविष्य की यह भिन्नता अंग्रेंजों की यही नीति थी।

 उपनिवेशवादी ताकतों की इस नीति का विश्लेषण करते हुए अमृत राय ने लिखा है कि इन भाषाओं को “बांटने वाली ताकतें एक सदी से काम कर रही थीं, जब 1800 ई. में कलकत्ता में फॉर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई थी। इसलिए यह सही नहीं लगता कि अंगे्रजों ने पुरानी संयुक्त हिन्दी/हिंदवी को दो अलग-अलग भाषाओं- आधुनिक हिन्दी और आधुनिक उर्दू में बांट दिया। हालांकि उनकी भूमिका थी, उन्होंने पहले से ही अस्तित्वमान इस विभाजन को देश में अपनी साम्राज्यवादी सत्ता के प्रबंध्न के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ खड़ा करने की अपनी नीति के अनुरूप एक भाषा के खिलाफ दूसरी भाषा को खड़ा कर दिया और भाषा सुधार आंदोलन की शृंखलाबद्ध प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप समय के साथ दोनों भाषाएं मुस्लिम और हिंदू खेमों में ध्रुव्रीकृत हो गई, जिसने उर्दू को साफ तौर पर एक मुस्लिम पहचान दी।”  भाषा से संबंधित अंग्रेजों की इस नीति का उल्लेख शम्सुर्रहमान रहमान फारूकी ने भी किया है। उन्होंने लिखा है कि “जब ‘उर्दू’ शब्द भाषा के नाम के तौर पर प्रचलित हो गया तो अंग्रजों ने भी ‘हिंदुस्तानी’ शब्द को त्याग दिया। इनमें इनका फायदा भी था, क्योंकि ‘उर्दू’ शब्द में मुसलमानी रंग ‘हिंदुस्तानी’ शब्द से अधिक था, और अंग्रेज यही चाहते थे कि “उर्दू” को मुसलमानों की भाषा के तौर पर जाना जाए।” इसी तरह की बात हिन्दी के साथ भी थी कि उसे हिन्दुओं की भाषा के तौर पर जाना जाए। इस मुद्दें पर औपनिवेशिक ताकतों की भूमिका को रेखांकित करते हुए असग़र वजाहत ने लिखा कि “भाषा और लिपि की समस्या को लेकर अंग्रेज विद्वानों के दो गुट थे। हिंदी-समर्थक ग्राउस साहब और उर्दू-समर्थक बीम्स साहब का वाद-विवाद 1865 से 1868 तक ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी जरनल’ में प्रकाशित होता रहा। इन दोनों विद्वानों के वाद-विवाद में यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि इन लोगों ने लिपि और भाषा के प्रश्न को हिंदू और मुस्लिम पुनरुत्थानवाद के साथ जोड़कर देखा और उसे सांप्रदायिक रंग दिया।”

 वसुधा डालमिया ने इस मसले के मूल में अंग्रेजों को मानते हुए देखते हुए लिखा है कि, “राष्ट्रीय भाषा की अवधरणा प्रारंभ में अंग्रेजों द्वारा लाई गई और भारतीय परिस्थितियों में इसे लागू किया गया। उनको एक भी भाषा ऐसी नहीं मिली जो राष्ट्रीय होने का दावा रखती हो। वैसे भी, मुगलकाल में ऐसी एक भाषा विभिन्न भाषाओं का मिश्रण थी, जिसे हिंदवी और हिंदुस्तानी कहा जाता था, जो कुछ हद तक उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग में समझी जाती थी। देश की इस जटिल भाषाई स्थिति में, अंग्रेजों ने हिंदुस्तानी के साथ यह प्रक्रिया प्रारंभ की, जो जल्द ही हिंदुओं और मुसलमानों की राष्ट्रीय भाषा के रूप में क्रमशः हिन्दी और उर्दू दो भागों में बंट गई और उसके बाद उनका दो स्वायत्त प्रिंट भाषा के रूप में विकास हुआ।” लेकिन यह बात इतनी सरल नहीं थी। अंग्रेजों ने देश के राजनीतिक, राजनीतिक जीवन को हिन्दुओं और मुसलमानों में विभाजित मानते हुए, इन दोनों समुदायों के बीच के अंतरों पर जोर दिया और इसी विभाजन पर ही हिन्दी-उर्दू बंटी थीं। देश को हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में बांटकर देखना जहाँ एक तरफ दोनों समुदायों के साझेपन और आपसी अंतर्क्रियाओं को नकारना था, वहीं दूसरी तरफ देश के अन्य समुदायों को तथा अपने आपको हिंदू और मुस्लिम समुदायों में न मानने वाले लोगों और समुदायों को भी विमर्श से बाहर करना था।

बहरहाल, फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापनाएं सैद्धंतिक थीं, सीधे आम जनता तक नहीं पहुंची और लोगों के बीच भाषाएं पहले की तरह ही चल रही थीं। 1832 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अदालतों की स्थापना की, तब भाषा का प्रश्न उपस्थित हुआ, यह “बहुत जरूरी था कि अदालती फैसले उस भाषा में दिए जाए जिसे न्यायाधीश जानता हो”, साथ ही यह भी उतना ही जरूरी था कि “आम जनता में प्रचलित भाषा में दिया जाय।” तब नीति निर्देशन यह बना कि “जज के लिए यह आसान है कि वह जनता की भाषा सीखें, बनिस्पत इसके कि जनता जज की भाषा सीखें। इसी नीति के परिणामस्वरूप फारसी अदालतों की भाषा बनी। फारसी उस समय उच्च वर्ग की भाषा थी और मुगलों के दरबारों की अधिकृत भाषा भी रह चुकी थी। उस प्रशासनिक स्वरूप को ही निरंतर रखने के लिए उस समय फारसी को अदालतों की भाषा बना दिया गया।

अंग्रेजों के इस फैसले का विरोध होने लगा। यह विरोध उस समय के पढ़े-लिखे नौकरी करने वाले उच्च तबके का विरोध था। इन विरोधों ने भारत में अंग्रेजों द्वारा लोगों को बांटने और लड़ाने के किए जा रहे प्रयासों को मौका दिया। इस संबंध् में एंथॉनी मैक्डॉनल की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही थी। फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रयासों से अकादमिक जगत में प्रारंभ हुई प्रक्रिया ने मैक्डानल के जरिए वास्तविकता धारण की। फारसी के विरोध और नागरी की मांग के लंबे आंदोलन के बाद 1900 में एक सर्कुलर जारी कर मैक्डॉनल ने संयुक्त प्रांत की अदालतों में नागरी प्रयोग की अनुमति दे दी। इस संबंध में आलोक राय ने लिखा है कि “…मैक्डॉनल ने आधुनिक हिन्दी के उद्भव और आधुनिक भारत के इतिहास में भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला दूरगामी कदम उठाया। 18 अप्रैल 1900 को मैक्डॉनल ने वह दूरगामी आदेश दिया जिसके तहत प्रांत की अदालतों में नागरी के इस्तेमाल की अनुमति दे दी, लेकिन यह सिर्फ नागरी का एकाधिकार नहीं था, यह कील का वह भ्रामक नुकीला सिरा था, जिसके चुभाने का अंतिम परिणाम भारत विभाजन हुआ।” हिंदू-मुस्लिम को बांटने की राजनीति का पटाक्षेप यही होना था।

संयुक्त प्रांत में यह कदम उठाने से पहले मैक्डॉनल बिहार में नागरी को मान्यता दे चुके थे। इस वजह से जब वे संयुक्त प्रांत में नियुक्त हुए तो वे नागरी समर्थकों के लिए आशा की किरण बन गए थे। आलोक राय के अनुसार “1900 से पहले ही मैकडॉनल हिन्दी और नागरी सर्कल में लोकनायक बने हुए थे। आखिर वे पश्चिमोत्तर प्रांत में अपनी बिहार की प्रतिष्ठा के साथ आए थे। बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यालयी सचिव के रूप में काम करते हुए मैक्डॉनल बिहार की अदालतों और प्रशासनिक कार्यों में नागरी वर्ण चलाने में सक्रिय भाग ले चुके थे।” फारसी और नागरी के इस विवाद में अंग्रेजों ने राजनीतिक संतुलन देखकर ही फैसले लिये थे। आगे वे संयुक्त प्रांत में भी हीरो बन गए थे। मदनमोहन मालवीय ने सम्मेलन के पहले सभापति के रूप में बोलते हुए हिन्दी की उन्नति के बारे में कहा था कि हमें इस “विषय में राजा का सहारा है। यदि उसके लिए यत्न करेंगे, तो वह भी मिलेगा। जो मांगा गया, वह मिला। हमने कहा था कि कचहरियों की भाषा हिन्दी भी कर दी जावे, राजा ने हमारे प्रदेशों में कचहरियों की भाषा हिन्दी भी कर दी।” इस तरह से नागरी पक्ष भी उनके कार्यो को सराह रहा था।

बिहार में नागरी लिपि की मान्यता के संबंध में आलोक राय ने हाली की लिखी सर सैयद की जीवनी से बंगाल के कार्यकारी लेफ्टिनेंट गर्वनर (कैम्पबेल) को साइंटिफिक सोसाइटी, भागलपुर, जो कि मुस्लिम संगठन था, द्वारा औपचारिक वक्तव्य प्रस्तुत किए जाने की एक दिलचस्प कहानी का उल्लेख किया है। स्वागत के उस औपचारिक भाषण में, उत्साह में, जबर्दस्ती अरबी और फारसी शब्दों को भर दिया गया था और कैम्पबेल इस बोलीको नहीं समझ पाए। इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि वह भाषा उस प्रांत की वर्नाकुलर कभी नहीं हो सकती और कुछ ही दिनों के अंदर उन्होंने नागरी वर्ण इस्तेमाल करने का आदेश दे दिया। हाली ने यह भी बताया कि कई मुस्लिमों और हिंदुओं ने इस आदेश के खिलाफ गुहार लगाई लेकिन लेफ्टिनेंट गर्वनर टस से मस नहीं हुए।

आलोक राय का यह मत सही है कि इस कहानी की बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन ऐसा नहीं है कि मैक्डॉनल इस घटना से इतने प्रभावित हो गए थे और उन्होंने यह मान लिया कि हिन्दी/नागरी ही यहां कि वर्नाकुलर हो सकती है। इस बात का खुलासा मैक्डॉनल के पत्रों से होता है। उन्होंने 22 अगस्त 1897 को लॉर्ड एल्गिन को लिखा कि “मुसलमानों की मजबूती सुरक्षा के लिए खतरा है।” कर्जन को लिखे उनके पत्र से उनके इरादे और उनकी चाल एकदम पता चल जाती है। उन्होंने लिखा कि “हम हिंदू प्रभुता (को उकसाने) के पक्ष में है, बनिस्पत कि मुस्लिम प्रभुता (को उकसाने) के, जो कि प्रकृति से हमारी शत्रु ही हो सकती है।” इस प्रकार यह एक मौका था जिसे लेफ्टिनेंट गवर्नर ने भुनाया। बिहार में 1870 ई में नागरी को मान्यता मिलने के दस साल बाद 1880 में मध्य प्रांत में भी नागरी को मान्यता मिल गई। इसके बाद 1884 में आए हंटर कमीशन के सामने अपने बयानों और बहसों में भी नागरी के समर्थन में नए तर्क दिए गए। इन तर्कों के जरिए ब्रिटिश शासन दोनों भाषाओं को अलग स्थापित होने देने के लिए इस्तेमाल कर रहा था।

फोर्ट विलियम कॉलेज और भाषा सर्वेक्षण के अतिरिक्त जनगणना को भी अंग्रेजों ने भाषाई विभाजन के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया। 1891 ई. की जनगणना में जहां भाषा का प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं था, वहीं 1901 की जनगणना में भाषा के प्रश्न को स्पष्ट रूप से दो खेमों में बांट दिया गया। आशा सारंगी के अनुसार, “1891 की जनगणना ने हिन्दी और उर्दू बोलने वालों को पांच भागों में वर्गीकृत किया था- ‘उर्दू जानने वाले’, ‘हिन्दी बोलने वाले’, ‘उर्दू और हिन्दी दोनों बोलने वाले’, ‘जो हिन्दी उर्दू से ज्यादा जानते हैं और ‘जो उर्दू हिन्दी से ज्यादा जानते हैं’। यह वर्गीकरण एक तरह के सामाजिक और भाषिक सहअस्तित्व, तरलता और बोधगम्यता को संकेतित करता है। उस समय तक जनगणना में दोनों भाषाएं दोनों समुदायों की विशेष और एक-दूसरे से अलग-अलग वर्गीकृत नहीं की गई थीं। लेकिन 1901 की जनगणना में इन दोनों भाषाओं के वर्गीकरण में एक बदलाव दिखाई पढ़ता है, जिसके अनुसार अब उक्त भाषाएं अपनी लिपियों और संबंधित सामाजिक पहचान के साथ पहचानी जाने लगीं- उर्दू, फारसी/मुस्लिम/इस्लाम के साथ और हिन्दी, नागरी/हिन्दू/हिन्दुत्व के साथ।” इस प्रकार अंग्रेजों ने जनगणना के जरिये भी भाषा-विवाद का स्थापित करने का काम किया।

आगे चलकर 1931 की जनगणना में फिर हिंदुस्तानी दर्ज किया गया। आशा सांरगी का मानना है कि राष्ट्रीय आंदोलन और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन में गांधी के महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप ने 192030 के गणना कार्यों को प्रभावित किया। पिछली जनगणना के विपरीत, 1931 की संयुक्त प्रांत की जनगणना ने इस बात पर जोर दिया था कि प्रांत की सामान्य भाषा हिन्दुस्तानी दर्ज की जाय। जनगणना अधिकारियों ने सोचा कि हिन्दुस्तानी को सामान्य भाषा के रूप में दर्ज कर वे हिन्दी और उर्दू के मौजूदा विवाद की अत्यध्कि जटिल सांस्कृतिक, वैचारिक और राजनीतिक आयामों से बच जाएंगे।” इस फैसले पर बहुत विवाद हुआ था, और सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में अलग-अलग दोनों भाषाओं पर इसका विशेष फर्क नहीं पड़ा था। जहां तक अंग्रेजों के फैसले की बात है, तो उसमें आर्थिक कारकों की भूमिका भी थी। गणना कार्यो में अलग-अलग भाषाओं की जगह हिंदुस्तानी का एक की कॉलम सरकार के लिए मितव्ययी था।

पहले भारत की विविधता के कारण यहां एकता और ‘भारत जैसी किसी चीज’ के अस्तित्व से ही मना करने वाले तथा बाद में भारत में राष्ट्रवाद और पहली बार प्रशासनिक एकता कायम करने का श्रेय लेने वाले अंग्रेज यदि भारत में वास्तविक एकता और राष्ट्रवाद के हामी होते, तो भाषा के मामले में वे इस तरह का विभाजन करने वाला नजरिया क्यों अपनाते! सही बात है कि अंग्रेजों के जरिए कम से कम भारत में भाषा की यह जागृति तो आई, लेकिन अंग्रेजों ने जानबूझकर यहां के भाषिक अंतरों को उकसाया, स्थापित किया और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया। यह केवल और केवल उपनिवेशवादी शासकों के लिए ही फायदेमंद रहा। कुछ लोगों का मानना है कि अंग्रेज राष्ट्रीयता की अवधरणा के तहत एक भाषा को स्थापित करना चाह रहे थे। अगर वे ऐसा चाह रहे होते तो भी इस भाषिक विविधता वाले देश में यह बात मुश्किल थी कि किसी एक भाषा को वे स्थापित कर लेते। वैसे उन्होंने उत्तर-भारत में ही भाषा का जो टकराव पैदा किया, उसे देखकर हम यह सोच नहीं सकते कि वे पूरे देश की एकता के बारे में सोचते होंगे।

इतिहास इस बात का गवाह है कि अंग्रेजों ने अपने साम्राज्यवादी हितों को ही प्राथमिकता दी और अपने फायदे के लिए भी उन्होंने यहां जो कुछ किया उसका बहुत बुरा परिणाम जनता को भुगतना पड़ा। विभाजन और दंगों में हजारों लोग मारे गये, हालांकि यहां की आपसी फूट से ही अंग्रेज मजबूत हुए थे। आजादी, विभाजन और भारत-पाकिस्तान की सरकारों को सत्ता हस्तातरित करने के वक्त भारत के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन यूं ही नहीं अपने आप को दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति समझ रहा था। साम्राज्यवादी शासकों द्वारा बोए गए विभाजन के बीज ही 1947 में आकर फलित हुए थे। ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण के दूरगामी प्रभावों के बारे में रामविलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि

उन्नीसवीं सदी के अंत में और बीसवीं सदी के आरंभ में ग्रियर्सन ने भारतीय भाषाओं से संबंधित जो बहुत-सा महत्त्वपूर्ण काम किया, उसका एक पक्ष भारत के विभाजन से संबंधित है। इस विभाजन के राजनीति में आर्यों और द्रविड़ों का भेद गौण है, हिन्दुओं और मुसलमानों का भेद मुख्य है। हिन्दुओं की भाषा हिन्दी है; बंगला, मराठी आदि अन्य भाषाएं भी हिन्दुओं की भाषाएं है; मुसलमानों की मुख्य भाषा एक ही है- उर्दू। ग्रियर्सन के भाषा विज्ञान में कभी इस बात पर ज़ोर नहीं दिया गया कि भारत के 90 पफीसदी मुसलमान कश्मीरी, सिन्धी, पंजाबी, बंगला और मलयालम बोलते हैं, उर्दू नहीं। किन्तु ग्रियर्सन के भाषाविज्ञान को आधार बनाकर जो राजनीति चलाई गई उसका निश्चित उद्देश्य साम्प्रदायिकता के आधार पर भारत का विभाजन था।

 1900 ई में पश्चिमोत्तर प्रांत में नागरी को मान्यता मिलने के साथ ही नागरी के पक्ष में और हिन्दी के संस्कृतकरण करने का अभियान चल पड़ा। इस अभियान में इस काल में निकलने वाली कई पत्रिकाएं शामिल थीं। अंग्रेज जिस हिंदू-मुस्लिम ध्रुव्रीकरण को पैदा करना चाहते थे, वह उस समय तक हो गया था। 1905 में अपने समुदायों का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। तब तक भाषा सवाल उनके लिए भी महत्त्वपूर्ण हो चुका था और कुछ ही समय में मुस्लिम लीग के प्रस्तावों में आ गया। दिल्ली (जनवरी, 1910) में हुए मुस्लिम लीग के तीसरे वार्षिक सत्र में उस समय चल रहे उर्दू विरोध के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था, “अखिल भारतीय मुस्लिम लीग कुछ प्रदेशों में उर्दू के भारत की एक प्राथमिक वर्नाकुलर के रूप में महत्त्व को ठेस पहुंचाने की तमाम कोशिशों की निंदा करती है और यह मानती है कि देश के आम विकास के लिए उर्दू भाषा और साहित्य की सुरक्षा और प्रगति आवश्यक है।” दूसरी तरफ कांग्रेस गांधी के प्रभाव से हिंदुस्तानी और हिन्दी पर अपना मत बदल रही थी और आखिरी में उसके दक्षिणपंथी पक्ष की विजय हुई तथा हिंदुस्तानी की हार।

अपने शासन के आखिरी दो-तीन दशकों में अंग्रेजों ने भाषा के मुद्दे पर ज्यादा हस्तक्षेप नहीं किया। उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता भी नहीं रह गई थी। एक तो बहुत पहले ही वे भाषा के क्षेत्र में अपना काम इतना अच्छे से कर चुके थे कि उसके परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। दूसरी बात यह भी थी कि अब उनके सामने विभाजन के लिए हिंदू और मुस्लिम समुदाय के नुमाइंदे स्वयं तैयार थे, इसलिए उन्हें अब भाषा के सहारे की आवश्यकता नहीं थी। तीसरी बात यह थी कि उस समय तक अंग्रेजों ने भारतीय जनता के तेवर भांप लिये थे, इसलिए तत्काल असर करने वाले राजनीतिक हथकंडों की जरूरत थी, अकादमिक स्थापनाएं अब मुख्यतः आर्थिक और सांख्यिकी विभाग में ही काम आ सकती थी, जो हर बजट वर्ष में बदल सकती हैं। चौथी बात यह कि अंग्रेजों का राज्य बहुत पहले स्थापित हो चुका था, और जिस शासन को वो चला रहे थे, उसे कई झटके भी लग चुके थे।

हिन्दी और उर्दू का विभाजन स्पष्टतः अंग्रेजों की उसी नीति के परिणाम के रूप में सामने आ रहा था इधर हिन्दी और उर्दू दोनों अपने आप को अलगाते हुए अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करने में लगी थीं, उधर कुछ प्रयास सामुदायिक एकता के लिए हिंदुस्तानी पर बल देने के भी हो रहे थे लेकिन अंग्रेजों ने जो नीति अपनाई थी, वह सपफलता प्राप्त कर रही थी, इस नीति की सफलता ने न केवल भाषा के मुद्दे को गड़बड़ किया, बल्कि भारत की एकता में नकारात्मक भूमिका ही निभाई।

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