हिन्दी एक भाषा मंच है:  विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी से पल्लव का साक्षात्कार

हिन्दी की अब तक प्रगति को आप किस रूप में देखते है?

Vishwanath Tripathiदेखिए, भाषाओं का इतिहास होता है और इतिहास की एक प्रक्रिया होती है. इस प्रक्रिया में सब चीजें होती है.हिन्दी भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया में है. जो भी जिस रूप में है, बिल्कुल ठीक उसी रूप में आगे नहीं रह सकती. लेकिन हिन्दी पर बात करते समय एक बात ध्यान में रखनी है कि, कई हिंदियां  है. हिन्दी बहुत बड़े क्षेत्र में बोली जाती है. यह हिन्दी भाषी क्षेत्र से भी दूर-दूर तक बोली जाती है. इसने अपने आप को खुद से इस रुप में अर्जित किया है और इसने इसे उपनिवेशवादियों की भाषा के रूप  में अर्जित नहीं किया है. बल्कि जो श्रमिक मजदूर हैं; मॉरीशस,फिजी आदि में गिरमिटिया बनके गए,जो अपने साथ रामचरित मानस, हनुमान चालीसा, पदावली ले गए. नेपाल,बांग्लादेश, अफगानिस्‍तान, इंग्‍लैड, कनाडा, यूरोप आदि में हिंदी का विस्‍तार है; यह अहिंदी क्षेत्र की बात है. फिर अखिल भारतीय रूप है. फिर राजभाषा है. इस समय कार्पोरेट जगत का हिंदी पर असर बहुत तेजी से पड़ा है. पर आप यह देखेंगे कि यहां कार्पोरेट ने हिंदी के प्रसार में सहायता की है. हिंदी इससे फैल रही है और सबसे अधिक योगदान शायद हिंदी का फिल्‍मों का है. हिंदी शायद फिल्‍मों के कारण इतनी प्रचारित हो रही है. अभी कर्नाड का एक बहुत अच्‍छा लेख/भाषण इस विषय पर हुआ था. जिसमें कर्नाड ने कहा कि सबसे बड़ी बात हिंदी फिल्‍मों की यह है कि – हिंदी फिल्‍मों ने अपना जातीय रूप बनाए रखा. ये बात सुनकर मैं चौंका,   बहुत दिनों बाद ही उन्होंने बताया कि  फिल्‍मों में इतने गाने दुनिया की किसी फिल्‍म में नही होते. यह क्‍या है? यह संस्‍कृत के नाटकों का असर है, पात्र जो बोल रहा है – नौटंकी देखो, पांडवानी देखो, आलहा, लोर कथा देखो, सारंगा देखो जहां प्रोज एवं पोएट्री दोनों का इतना मेल मिलता है।  यह हिंदी फिल्‍मों का ऐसा पक्ष है जहां उन्होंने अपना भारतीय स्वरूप बचाए रखा है। और इस रूप में हिंदी सिनेमा का हिन्दी की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान है. यहां यह भी स्‍वीकार किया जा सकता है कि फिल्मों में हिंदी-उर्दू का झगड़ा नहीं है.

ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजी धीरे-धीरे हिन्दी का स्थान ग्रहण कर रही हैं. इस बारे में आपका क्या कहना है. 

अब कुछ लोग यह कहते हैं कि अंग्रेजी धीरे-धीरे हिन्दी का स्‍थान ग्रहण कर रही है। वे यह भी कहते हैं कि अंग्रेजी साम्राज्‍यवादियों की भाषा है और जब तक साम्राज्‍यवादी मार्केट का वर्चस्‍व है तब तक यह वर्चस्‍व बना रहेगा. मैं उन लोगों में से नही हूं जो ये मानते हैं कि साम्राज्यवादी मार्केट का वर्चस्‍व हमेशा बना रहेगा. मुझे साफ दिखाई पड़ रहा है कि ऐसी शक्तियां सक्रिय हैं, धीरे-धीरे वे आगे बढ़ रही हैं  और इस तरह के मार्केट को ध्‍वस्‍त करेंगी. चीन का प्रभाव आपने देखा होगा। दिल्‍ली या बड़े शहरो में चीनी भाषा और साहित्‍य का बड़ी तेजी से प्रचार-प्रसार हो रहा है. जैसे पहले कुछ दिनों रुसी का हो गया था.

सिर्फ  हिंदुस्तान ही ऐसा देश है जहां इतनी संभावनाएं हैं।  जैसे-जैसे हम स्‍वतंत्र होते जाएंगे, हमारे पास पॉवर आती जाएगी, वैसे-वैसे हम अपनी भाषाओं का विस्‍तार करते जाएंगे. जबसे हिंदुस्‍तान आजाद हुआ है अमीरी बढ़ी है लेकिन ऐसा नही है कि अमीरी बढ़ने से हिंदी घटी है. इसमें दिक्‍कत यह  है कि हम जो हिंदी लोग हैं वो अपने साथ की दूसरी भारतीय भाषाओं को इसमें नहीं देखते. जो इस समय हिन्दी की स्थिति है उसकी तुलना में कन्नड़ की स्थिति, बांग्ला की स्थिति, पंजाबी की स्थिति, मराठी की स्थिति तो मार्केट के हिसाब से सबसे खराब स्थिति है।  लेकिन तुम यह सोच सकते हो कि जो बांग्ला भाषा है या जो कन्नड़ भाषा है वह एक महान सांस्कृतिक परम्परा है। उनकी  फिल्में, उनका साहित्य, उनकी कविता, उनकी बोलचाल,उनकी भाषाओं और बोलियों की आतंरिक शक्ति इतनी अधिक है.

हिन्दी के इतने रूप  हैं और मै आशान्वित हूं कि यह अच्छा विकास कर रही है.

pallavहिन्दी की प्रगति में जो भी बाधाएं है. उसको दूर करने के बारे में आप क्या उपाय बताना चाहेंगे?

उपाय मैं नही जानता. लेकिन जब आपने ये प्रश्‍न किया तो इस समय जो संभव है, मैं उसकी बात करुंगा। देखिये भारतीय आदमी नौकरी या व्यापार पाने के लिए बिना अंग्रेजी काम नहीं चला सकता. अंग्रेजी को हिंदुस्‍तान नहीं छोड़ सकता. एक बार मैंने फिराक गोरखपुरी से पूछा कि जब अंग्रेजी की जगह कोई विदेशी भाषा स्‍वीकार करनी है तो क्‍यों न हम फ्रेंच को स्‍वीकार करें? रुसी को क्‍यों न स्‍वीकार कर लें? उसके लिए उन्‍होंने जवाब दिया कि उसके लिए  हम दो सौ वर्ष फिर फ्रांस के अधीन रहें क्‍योंकि यह  इतिहास का निर्णय है उसे आप नहीं बदल तो सकते.

कभी-कभी हम भूल जाते हैं कि अंग्रेजी कितनी सकारात्‍मक भाषा है. सारी बुराईयों के बावजूद हमें यह देखना चाहिए कि देश के स्‍वाधीनता आंदोलन में अंग्रेजी ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई. सकारात्मक भूमिका भी देखें…. तो अंग्रेजी पढ़ना चाहिए. पर व्‍यक्ति को अपनी पारिवारिक भाषा, स्‍थानीय भाषा, प्रारंभिक स्‍कूल में पढ़ी भाषा को भूलना नहीं चाहिए। अपने देश में जो फाइनैंस है वह सब हिंदी में होना चाहिए. हमारा आधार हिंदी होना चाहिए. त्रिभाषा फार्मूला  बहुत बढ़िया था. उस युग में जो समाधान दिए गए वो ज्‍यादा बेहतर थे. ज्‍यादा संतुलित थे और ऐसा भी नहीं है कि ये उपाय व्‍यावहारिक न हों.

वास्‍तव में राजभाषा के प्रसार के लिए क्‍या किया जाना चाहिए.

जो बातें इस सम्बन्ध में जरुरी लगती जाएं उन्हें  करना चाहिए. देखिए कुछ तो काम इस दिशा में हुआ है. राजभाषा अधिकारी अपने दायित्‍व का निर्वहन करें. सबसे बड़ी बात जो स्‍वप्‍न होता है, उसके प्रति कमिटमेंट होता है, जो व्‍यग्रता होती है, व्‍याकुलता होती है कि  स्‍वप्‍न को पाना चाहिए, पूरा करना चाहिए. अपने से बढ़कर जो स्‍वप्‍न का आदर्श होता है उसे पूरा करना चाहिए. तो इस रूप में यह विचार का बड़ा गंभीर विषय है।

इसी व्‍याकुलता और व्‍यग्रता से राजभाषा के रुप में हिंदी के कार्य को किया जाना चाहिए और एक बात जो मैं  सीमा से बढ़कर कहूं कि ये जो सांस्‍कृतिक नपुंसकता है जो हमें करना चाहिए उसके प्रति करने और न करने में कोई फर्क नहीं अगर हम हिंदी में लिखना शुरू कर दें तो क्‍या बैंक में हमारा चेक वापस आएगा? नहीं आएगा, बि‍ल्‍कुल नहीं आएगा. तो इसके लिए एक सांस्‍कृतिक आंदोलन, सांस्‍कृतिक चेतना होनी चाहिए. तुम सोचो जो हमारी वामपंथी पार्टीयां हैं उसमें से कोई भाषा को लेकर आंदोलन करे. जैसा समाजवादियों ने किया था. सच्‍ची बात यह है कि पालिटिकल एक्टिविज्म  नहीं है. यहां जिम्‍मेदारी सरकार के स्‍तर पर हो तो बेहतर है. तो हमें इस शिथिलता को तोड़ने के लिए एक तरह का कल्‍चरल एकिटिविज्म चाहिए और ऐसा बिना भाषा प्रेम के नहीं हो सकता। इस स्तर पर कोशिश की जानी चाहिए.

हमारे यहां एक बात अक्सर कही जाती है कि जैसा प्रेम अपनी भाषा के प्रति बांग्ला या कन्नड़ या मराठी लोग करते है वैसा हिन्दी वाले हिन्दी भाषा के प्रति नहीं करते।  यह अगर सच है तो आप इस विषय परक्या कहेंगे ?

इसके कई पेच हैं।  इसके कारण कई हैं।  असल मे हिन्दी एक भाषा मंच है और हिन्दी की इन बोलियों का,जिनका मैंने आप से नाम लिया, उन बोलियों में कई बोलियां ऐसी हैं – जिनका साहित्य और सांस्कृतिक परम्परा खड़ी बोली की साहित्य और सांस्कृति परम्परा से उन्नत है जैसे अवधी या ब्रज। इन सबका जो साहित्य है और राजस्थानी की तो मैं बात ही नहीं कर रहा क्योंकि थोड़ा-सा विवादास्पद मामला है अब मैं तुम से कहूं कि तुम अगर यह बात जो तुम हिन्दी वालों के बारे में कह रहे हो वो बात तुम अवधी के बारे में नहीं कह सकते हो,वो बात तुम ब्रज भाषा के बारे में नहीं कह सकते हो, वो बात तुम राजस्थानी के बारे में नहीं कह सकते हो, यह बात तुम उर्दू वालों के बारे में भी नहीं कह सकते हो।  यह जो हिन्दी है इसके बारे में तो कभी-कभी भाषा का प्रेम बोलियों के प्रति प्रेम से अभिव्यक्त होता है और इस रूप में लेते हुए ऐसा नहीं कहा जाता कि हिन्दी वालों अपनी भाषा के प्रति प्रेम नहीं है।

भाषाओं की जो  सांस्कृतिक विरासत है, सांस्कृतिक प्रेम है वो पूरे हिन्दुस्तान भर में भक्त कवियों की कविताओं के प्रति जितना हिन्दी क्षेत्र में है उसे देखना होगा। हिन्दी क्षेत्र का व्यक्ति तुलसी व कबीर की कविता को जितना प्रेम करता है उतना  प्रेम कन्नड़ का व्यक्ति वहां के कवि को नहीं करता होगा. ये तुलसी, कबीर, मीरा इनसे जुड़ा हुआ है हिन्दी का प्रेम यह जो अयोध्या है मथुरा है वृंदावन है इस क्षेत्र के लिए जो संस्कृति है जो रिलिजन है इसमें कई कारणों से कंफ्यूजन है तो उसका जो असर है वो यह कि भारत की ह्रदय स्थली और हिन्दी का वह भोगना पड़ा रहा है. तो कुल मिलाकर हमें चीजों को समग्र नजरिए से देखने की जरुरत है.

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