सौ बरस के भीष्म साहनी: पल्लव

pallavभीष्म साहनी हिन्दी के सबसे सम्मानित कथाकारों में हैं। सम्मानित से आशय है जिन्हें पाठकों, आलोचकों और व्यापक समाज से लेखन के लिए भरपूर सम्मान और प्रेम मिला। स्वतंत्रता पूर्व रावलपिंडी में 1915 के 8 अगस्त को उनका जन्म हुआ था। उनके पिता कपडे के सामान्य व्यापारी थे और चाहते थे कि उनके दोनों बेटे भी इसी रास्ते पर चलें। इसके लिए बचपन से ही दोनों बेटों को आर्य समाज की नैतिक शिक्षा का वातावरण दिया गया। फिर भी ऐसा हुआ कि पिता हरबंसलाल साहनी की इच्छा के विपरीत बड़ा बेटा शांतिनिकेतन के रास्ते बम्बई चला गया और आगे जाकर एक महान अभिनेता बलराज साहनी के नाम से विख्यात हुआ। भीष्म जी पढ़ाई के बाद पिताजी के दबाव में दूकान संभालने लगे और उन्होंने कमीशन एजेंट के रूप में काम भी किया।लेकिन वे इस काम के लिए नहीं बने थे और अंतत: वे अध्यापन के क्षेत्र में आ गए। वे अब लाहौर आ गए थे जहाँ कुछ अरसा पहले उनके बड़े भाई भी रहे थे यहां उन्हें रंगमंच की अपनी रुचि पूरी करने का अवसर मिला और वे इप्टा के संपर्क में आ गए। इधर देश में आजादी का आंदोलन जोरों पर था और उन्हें तब कांग्रेस का सदस्य बनना आवश्यक लगा, यह कदम उनके लेखन के लिए ऐसे अनुभव दे गया जिनसे एक अविस्मरणीय रचना का जन्म हुआ।

यह 1945 का समय था जब रावलपिंडी के आसपास साम्प्रदायिक दंगे फ़ैल गए। यह जहर इतना भयानक था कि गाँवों में भी बलवे हुए। कांग्रेस के सदस्य होने के नाते भीष्म जी को इन क्षेत्रों में जाने और वारदातों में नुकसान के रजिस्टर लिखने का काम दिया गया। इन अनुभवों ने आगे भीष्म जी को ‘तमस’ उपन्यास लिखने की प्रेरणा दी जो भारत विभाजन पर लिखी गई कृतियों में अग्रणी है। देश की आजादी के समय भीष्म जी दिल्ली में थे और उन दिनों इप्टा में जी जान से काम करने के सतह उन्होंने अम्बाला और जालंधर के कालेजों में अंगरेजी का अध्यापन भी किया। अंतत: दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कालेज ( जो तब दिल्ली कॉलेज के नाम से मशहूर था) में अंगरेजी अध्यापक के रूप में काम करते रहे। बीच में उन्हें सात वर्ष सोवियत संघ के प्रवास का अवसर भी मिला और अनेक रूसी किताबों को उन्होंने हिन्दी में अनुवाद के मार्फ़त उपलब्ध करवाया। वहां रहते हुए उन्होंने टालस्टॉय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘रिसरेक्शन’ सहित लगभग दो दर्जन रूसी पुस्तकों का सीधे रूसी से हिंदी में अनुवाद किया।  फिर उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के साथ भारतीय लेखकों को जोड़ने और साहित्य को जन जन तक पहुंचाने का काम भी किया यही नहीं वे एफ्रो एशियाई लेखक संघ से भी जुड़े और उसकी पत्रिका लोटस के अंकों का सम्पादन किया। इतने सक्रिय सार्वजनिक जीवन के साथ भीष्म जी ने लेखन को कभी स्थगित नहीं किया। अमृत राय के सम्पादन में हंस पत्रिका में उनकी पहली कहानी ‘नीली आँखें’ छपी थी इसके बाद उन्होंने अनेक कहानियाँ, उपन्यास और नाटक लिखे। हिन्दी के लाखों पाठकों के ह्रदय को छूने वाली कहानी ‘चीफ की दावत’ और साम्प्रदायिकता के जहर की विभीषिका बताने वाली कहानी ‘अमृतसर आ गया है’ उनकी ही कृतियाँ हैं। भीष्म जी नयी कहानी के सुनहरे दौर में कहानी लेखन के क्षेत्र में आये थे लेकिन आधुनिकतावादी फैशनपरस्त लेखन के स्थान पर उन्होंने जो रास्ता चुना वह जनधर्मी मार्ग था जिसमें पश्चिम से आयातित जीवन शैली की आलोचना और मनुष्यता के व्यापक सरोकारों को सीधी सरल शैली में प्रस्तुत करना उन्हें आवश्यक लगता था। क्या आश्चर्य कि वे अपनी कहानियों में एक तरफ मध्य वर्ग के पाखण्ड से लड़ रहे थे तो दूसरी ओर कबीर और हानूश के बहाने मामूली लोगों के जीवन के चित्र साहित्य की मुख्यधारा में अंकित कर रहे थे। वे नयी कहानी के उन कथाकारों में हैं जो कहानी में अभिजनवाद से पृथक रहकर अपने समय और समाज के असल संघर्ष को चित्रित करने में विश्वास रखते थे। अमरकांत, शेखर जोशी के साथ उनकी त्रयी नयी कहानी की वह त्रयी है जो कहानी को फैशन की तरह नहीं अपितु सच्ची मनुष्यता के चित्रांकन का कलात्मक उपकरण समझती थी। नयी कहानी का अंतत: अकहानी में बदलकर तिरोहित होना भीष्म जी के मनुष्यधर्मी प्रगतिशील रास्ते साबित करता है।

Source: Outlook India

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पंजाब के भरे पूरे समृद्ध जीवन पर महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’ भीष्म जी की ही नहीं हिन्दी लेखन की भी उपलब्धि है जिसमें कोई दो सौ सालों का वृत्तांत इस तरह बुना गया है कि पाठक से भुलाए न भूले।  झरोखे, कड़ियाँ, बसंती, कुंतो, नीलू नीलिमा नीलोफर उनके अन्य उपन्यास हैं जिनमें से कुछ शुरुआती दौर के हैं तथा नितांत निजी अनुभवों पर भी हैं। जो बात इन सभी उपन्यासों को पठनीय बनाती है वह है भाषा की अपूर्व सादगी और कहने का कौशल। पारिवारिक जीवन की कथा होने पर भी झरोखे और कड़ियाँ जैसे उपन्यासों को बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय समाज के चित्रों की तरह देखा जा सकता है।

साम्प्रदायिकता को भीष्म जी देश और समाज के लिए सबसे खतरनाक मानते थे क्योंकि उन्होंने इस विष के कारण अपने वतन के विभाजन को भोगा था। अकारण नहीं कि साम्प्रदायिकता पर उन्होंने न केवल ‘तमस’ जैसा मूल्यवान उपन्यास लिखा अपितु ‘मुआवजे’ और ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ भी वे इस समस्या से टकराते हैं। ‘तमस’ अपने फिल्मांकन के कारण एकाएक चर्चित हो उठा था लेकिन उसकी असली ताकत दंगों और घृणा के घनघोर अन्धकार में भी मनुष्यता के छोटे छोटे सितारे खोजने में है। भीष्म जी ने इप्टा के लिए कई नाटकों में अभिनय  किया था। इस फिल्म में हरनाम सिंह का के रूप में किया गया उनका अभिनय भले बहुत असाधारण न रहा हो लेकिन उस दौर की त्रासद यादों को ताज़ा करने में सफल रहा था। ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ तथा ‘मिस्टर एंड मिसेज अय्यर ‘ सहित कुछ अन्य फिल्मों में भी उन्होंने अभिनय किया। कुछ टीवी सीरियल्स में भी वे आए वे आए और कहना न होगा कि तमाम गतिविधियों के पीछे  उनकी गहरी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता दिखाई देती है। जिन दिनों वे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव थे तब देश के छोटे बड़े शहरों में उनकी लगातार यात्राएं और लोगों को लिखे अनगिनत पत्र उनकी असाधारण निष्ठा के परिचायक हैं। आलोचक नामवर सिंह ने कहा था- ऐसा भी कोई होगा जो भीष्म को न जाने?

2015-08-10 10.17.24‘पाली’, ‘माता विमाता’ और ‘वांग्चू’ जैसी कहानियाँ भी सभी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ मनुष्यता का जयगान करती हैं। वे जानते थे कि कोई राष्ट्र अपने भीतरी झगड़ों और अविश्वास को खत्म किए बगैर आगे नहीं बढ़ सकता इसीलिए उन्हें साम्प्रदायिकता एक बड़ी समस्या लगती थी और दंगे मनुष्यता के प्रति जघन्य अपराध। वे समाज की छोटी बड़ी समस्याओं को अपने लेखन में बार बार बेपर्दा करते हैं ताकि इनसे लड़कर हम सचमुच आगे बढ़ें, यदि इन्हें छिपाया-ढका जाएगा तो ये आगे जाकर नासूर बनेगीं। भीष्म जी की अनेक कहानियाँ इस बात की गवाही देती हैं। ‘लीला नंदलाल की’ जैसी कहानी भ्रष्टाचार, तो ‘साग मीट’ और ‘संभल के बाबू’ मध्य वर्ग के जीवन पर उम्दा कहानियाँ हैं। इसी तरह यह भी उन्हें आवश्यक लगता था कि अपने देश के निर्धन और पीछे छूट गए लोगों से हम प्रेम करें,उनके प्रति किसी तरह की हिकारत न रखें। उनकी कहानियाँ  ‘पिकनिक’ और ‘गंगो का जाया’ कभी पुरानी नहीं पड़ सकती।

स्त्री विमर्श के नए दौर के आगमन के पर्याप्त पहले उन्होंने ‘माधवी’  शीर्षक से एक नाटक लिखा जिसमें महाभारत में आई माधवी की कथा को आधुनिक संदर्भों में उन्होंने प्रस्तुत किया है। इस नाटक में माधवी के संवाद तथा उसके प्रेमी गालव के व्यक्तित्त्व का लिजलिजापन इस नाटक को हमारे समय की आवश्यक कृति बना देता है। माधवी की निरुपायता और विवशता के बावजूद अंत में उसका निर्णयसक्षम होना एक प्रगतिशील कलाकार की परिपक्व दृष्टि से ही सम्भव था। ‘हानूश’ सत्ता और कलाकार के संबंधों पर लिखा ऐसा नाटक है जो अपनी विदेशी पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय पाठकों के मन को छूने वाला था। इसे आपातकाल के विरुद्ध कृति समझने वालों की कमी नहीं। स्वयं भीष्म जी ने लिखा है-‘इसमें संदेह नहीं कि निरंकुश सत्ताधारियों के रहते, हर युग में, हर समाज में, हानूश जैसे फनकारों-कलाकारों के लिए एमर्जेन्सी ही बनी रहती है और वे अपनी निष्ठा और आस्था के लिए यातनाएँ भोगते रहते हैं।’ वहीं ‘मुआवजे’ और ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ ऐसे नाटक थे जो रंगकर्मियों ने खूब खेले और आज भी इनके दर्शकों की कमी नहीं है। भीष्म जी ने मुग़ल बादशाह औरंगजेब के जीवन पर भी एक नाटक ‘आलमगीर’ लिखा जो एक साथ सत्ता और व्यक्ति के कट्टर होने पर पतन की अनिवार्य नियति को दर्शाता है।

भीष्म जी की आत्मकथा ‘आज के अतीत’ हिन्दी भाषा में लिखी गई बहुत थोड़ी श्रेष्ठ आत्मकथाओं में है जहाँ लेखक स्थितियों और घटनाओं का विवरण देता गया है और मूल्य निर्णय का अधिकार पाठकों को दे देता है। एक समय में राजकमल प्रकाशन की लोकप्रिय पत्रिका ‘नई कहानियाँ’ का सम्पादन करने और देश के सबसे बड़े लेखक संगठन प्रगतिशील लेखक संघ के शीर्ष जिम्मेदार पदों पर रहने पर भी कोई व्यक्ति इतना निस्संग और निरभिमानी हो सकता है यह वाकई हमारे बड़बोले समय में अनुकरणीय है। अपने बड़े भाई बलराज साहनी की जीवनी ‘मेरा भाई बलराज’ उन्होंने अंग्रेजी में लिखी थी और स्वयं ही हिन्दी में अनुवादित भी किया था। असल में कहा जा सकता है कि ऊँचे नैतिक मूल्यों और सदाचारी स्वभाव के कारण बड़े लेखक होने के साथ भीष्म साहनी बड़े मनुष्य भी थे। उनकी जन्म शताब्दी आजादी के आंदोलन से निकले ऐसे सेनानी की शताब्दी है जो जीवन भर अपने देश और समाज के प्रति गहरे प्रेम के कारण सृजनशील रहा और वह भी सर्वथा निस्पृह भाव से।

(दैनिक जागरण, 03.08.2015)

pallavkidak@gmail.com

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