‘अच्छा! यह जेएनयू से है!’ : प्रो. नामवर सिंह से बातचीत

जाने माने आलोचक प्रो. नामवर सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमरिटस हैं। जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र की संकल्पना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सैद्धांतिकी पर जोर देने वाले पाठ्यक्रमों और सतत मूल्यांकन पद्धति के साथ-साथ उनका महत्वपूर्ण योगदान हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं का एक ही केन्द्र बनाना भी है। एक ही परिवेश के बावजूद हमारे इतिहास में इन दोनों भाषाओं के बीच राजनीतिक संघर्ष की स्थिति रही है, ऐसे में इन दोनों भाषाओं को एक साथ रखना एक महत्वपूर्ण कदम था। प्रस्तुत हैं, जेएनयू से जुड़े मुद्दों पर उनसे एक बातचीत 

गणपत: आप हिन्दी के चर्चित आलोचक हैं और जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र के पहले प्रोफेसर हैं। जेएनयू से आप कैसे जुड़े?

Prof. Namvar Singh

Prof. Namvar Singh

नामवर सिंह- मैं जेएनयू आने से पहले जोधपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर होकर गया था और उसके बाद मुझे वहाँ रहते हुए ही आगरा विश्वविद्यालय के कन्हैया लाल माणिक्यलाल मुंशी संस्थान के निर्देशक पद के लिए बुलाया गया था। बालकृष्ण राव वहाँ नए कुलपति बने थे। संस्थान में मुझसे पहले डॉ. रामविलास शर्मा थे। राव साहब ने मुझे प्रस्ताव भेजा। वे इलाहाबाद से थे और मुझे जानते थे। वे साहित्य प्रेमी थे और कविताएँ भी लिखते थे। कुछ समय पहले मुझे भनक मिली थी कि जवाहरलाल विश्वविद्यालय बन रहा है और मुझे वहाँ से आमन्त्रण आने वाला है। मैंने राव साहब को भी बता दिया था कि मुझे जेएनयू जाने की सूचना मिली है लेकिन औपचारिक पत्र नहीं आया है। आप कहें, तो मैं जोइन करूं? उन्होंने कहा, ‘आइये आप।’ तो मैं जोधपुर से रामविलास जी की सेवानिवृत्ति के बाद कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी संस्थान में निर्देशक-प्रोफेसर बनकर आ गया था। वहाँ पर बंगला खाली ही था। रामविलास जी का वहाँ घर था, इसलिए वे गये नहीं बंगले में। मैं भी उसमें नहीं गया और दिल्ली में अपने एक मित्र के घर पर ही रहता था। मैं दिल्ली से हर रोज ताज एक्सप्रेस से आगरा जाता था और उसी से शाम में लौटता था। मेरे रहते हुए ही वहाँ हम लोगों ने रामविलास जी का सम्मान किया। दोपहर के खाने के लिए राव साहब ने कहा कि आप हमारे घर खाया करिए। लगभग एक महीना इस तरह से चलता रहा और अंतत: मुझे जेएनयू से पत्र मिल गया। मैंने राव साहब को पत्र दिखाया कि नया विश्वविद्यालय बन रहा है, मुझे विभाग बनाने के लिए बुलाया जा रहा है। आप मेरे शुभचिंतक हैं, आप सहमत होंगे। तो उन्होंने कहा कि ठीक है, मैं बाधक नहीं बनूंगा लेकिन एक महीने की तनख्वाह नहीं दूंगा। मैंने कहा कि मैं स्वयं ही प्रस्तावित करता हूँ कि मैं सेलेरी नहीं लूंगा। फिर उन्होंने स्वीकृति दे दी। इस तरह से मैं आगरा विश्वविद्यालय से मुक्त होकर जेएनयू आ गया।

गणपत: उस समय का जेएनयू कैसा था? नये केन्द्र की क्या स्थिति थी?

नामवर सिंह: तब पुराना कैंपस था, नया कैंपस बन रहा था। मैं एनसीईआरटी के पास की एक कॉलोनी में कमरा लेकर रहता था। उस समय मंडी हाउस के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की बस आती-जाती थी, लेकिन उसका रास्ता दूसरा था। मैं ऑटो या बस से आता-जाता था। उस समय हिन्दी में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में डॉ. सावित्री चंद्र शोभा थीं। उनके पति सतीश चन्द्र इतिहास विभाग में थे और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष थे। उर्दू में भी उस समय दो ही लोग थे- डॉ. एस.आर. किदवई और डॉ. असलम परवेज़ लेकिन कोई प्रोफेसर नहीं था। हिन्दी में हम दो लोग थे और प्रवेश प्रक्रिया भी शुरू हो रही थी, सेमेस्टर सिस्टम का पाठ्यक्रम भी बनाना था, इसलिए तीसरे आदमी चिंतामणी जी को लाया गया। उधर उर्दू में भी प्रोफेसर की आवश्यकता थी। डीयू के मोहम्मद हसन साहब उस समय किसी फैलौशिप पर थे, मैं पहले से उन्हें जानता था। मैंने वाइस चांसलर से कहा कि मोहम्मद हसन साहब को जल्दी बुला लिया जाय, सेलेक्शन कमिटी की ज़रूरत नहीं है। हम लोगों ने यह भी तय किया कि और विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग और उर्दू विभाग होते हैं, लेकिन यहाँ सेंटर हैं तो एक ही सेंटर होगा और उसे हम भारतीय भाषाओं का केन्द्र कहेंगे, सेंटर ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज़।

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गणपत: जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र की एक विशेषता है कि इसमें हिन्दी और उर्दू एक साथ पढ़ाई जाती है। आपकी इस संकल्पना के पीछे क्या समझ थी?

नामवर सिंह: मेरी एक समझ थी कि हिन्दी और उर्दू के बीच एक लंबा संघर्ष इस देश में चलता रहा है, इसलिए दोनों भाषाओं को एक साथ लाना चाहिए और जवाहरलाल नेहरू के नाम पर बना विश्वविद्द्यालय अगर यह नहीं करेगा तो और कौन करेगा! इसलिए भारतीय भाषाओं का सेंटर एक ही रहेगा और गुंजाइश रहेगी कि भविष्य में इसमें अन्य आधुनिक भारतीय भाषाएँ भी आएंगी जिनमें तमिल आदि दक्षिण की भाषाएँ भी होंगी, मराठी होगी, बांग्ला होगी, अन्य भाषाएँ भी होंगी। संस्कृत चूंकि क्लासिक भाषा है इसलिए वह अलग रहेगी। नाम के अनुसार यह केन्द्र भरा-पूरा होना चाहिए और इसकी शुरुआत हिन्दी-उर्दू से होनी चाहिए क्योंकि हिन्दी और उर्दू के बीच राजनीतिक संघर्ष रहा है। हम हिन्दी-उर्दू एक साथ होंगे तो यह सुविधा होगी कि हम अन्य भारतीय भाषाओं के लिए गुंजाइश रखें और भारतीय साहित्य पढ़ाए- यह हमारा सपना था। शुरुआत हमने हिन्दी-उर्दू से की, आगे चलकर बहुत दिनों बाद तमिल भी आ गई। अभी भी यह अधूरा है, भारतीय भाषा केन्द्र पूरा नहीं बना है। कायदे से तो भारतीय भाषाओं का एक अलग स्कूल होना चाहिए लेकिन हमने कहा कि एक बार सेंटर तो बन जाए, जब और भाषाएँ जुड़ जाएंगी, यह बड़ा हो जाएगा, तब स्कूल भी बन जाएगा। यह दृष्टि हमारी थी और इस दृष्टि से हमने हिन्दी-उर्दू को साथ रखा। स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज़ में रूसी बहुत पहले से थी, अन्य विदेशी भाषाएँ बाद में आईं। विदेशी भाषाएँ हमारे यहाँ इसलिए थीं कि स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में इन भाषाओं की जानकारी की ज़रूरत होती थी। भारतीय भाषाओं की शुरुआत हिन्दी-उर्दू से हुई और कुछ पेपर भी कॉमन रखे गए। हम लोगों ने यह भी तय किया कि हिन्दी के विद्यार्थी उर्दू जाने और उर्दू के हिन्दी। इसलिए एक ऐसा पेपर भाषा का और एक साहित्य का अवश्य हों। यदि हिन्दी भाषा का इतिहास पढ़ाया जा रहा है तो उर्दू का इतिहास भी पढ़ाया जाना चाहिए। इसी तरह से हिन्दी साहित्य पढ़ाया जा रहा है तो तुलनात्मक रूप से उर्दू साहित्य की प्रवृत्तियाँ भी जानना ज़रूरी होना चाहिए।

गणपत: आज अकादमिक जगत में जेएनयू के हिन्दी अध्ययन की एक विशिष्ट पहचान है और जेएनयू में भी इसकी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति है, इसकी शुरुआत के बारे में बताइये।

नामवर सिंह: अन्य जगहों की तरह हमारा हिन्दी विभाग नहीं है। इसकी समझ, इसकी दृष्टि, इसकी मानसिकता अलग है। यह हमारा विज़न था कि यहाँ का हिन्दी और उर्दू का अनुशासन दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य विश्वविद्यालयों से अलग होगा, हमारा पाठ्यक्रम भी अलग होगा और दोनों का संबंध भी अलग होगा। तीन अध्यापकों से हमने शुरुआत की थी। हम लोग तो ऑफर से आए थे लेकिन बाद में लोग चयन समिति से आये थे। केदारनाथ जी (प्रो. केदार नाथ सिंह) उत्तर प्रदेश में प्रिंसिपल थे। मैं जानता था कि वे स्वयं कवि है, इसलिए मैंने आधुनिक कविता पढ़ाने के लिए उन्हें बुलाया। शोभा जी की विशेषज्ञता भक्तिकाल की थी। पांडे जी (प्रो. मैनेजर पाण्डेय) जोधपुर विश्वविद्यालय में थे। किन्हीं कारणों से वे एक साल तक नहीं आ पाये लेकिन मुझे उनकी ज़रुरत थी। उनकी साहित्य सिद्धांत में रुचि थी और भक्ति पर काम था। मुझे भी भक्ति काव्य और आंदोलन के लिए बेहतर व्यक्ति की ज़रूरत थी। पांडे जी ने मुझे एक बरस तक इंतज़ार कराया, मैंने उन्हें कहा कि मैं इंतज़ार करूंगा लेकिन आप आएंगे ज़रूर। इस तरह मैं चुनकर लोगों को ले आया था।

हमारे यहाँ के कोर्स भी दूसरी तरह से बनाए थे। हमने साहित्य सिद्धांत पर ज्यादा जोर दिया था। हमारे यहाँ पाठ की तुलना में साहित्य सिद्धांत के कोर्स ज्यादा हैं। इसलिए जेएनयू से पढ़कर निकले विद्यार्थी साहित्य सिद्धांत अधिक जानते हैं। हमारे लिए यह बहुत बड़ी चुनौती थी कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में विलक्षण हो। यह आरंभिक कार्य था जो हमने किया। दो विश्वविद्यालयों- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और जोधपुर विश्वविद्यालय- को तो मैंने देखा ही था लेकिन वहाँ इतनी गुंजाइश नहीं थी। पुराने ढंग का पाठ्यक्रम था, सेमेस्टर सिस्टम भी कहीं नहीं था। हमने सेमेस्टर सिस्टम के हिसाब से नये ढंग के कोर्स बनाए। जेएनयू में हमारा जोर इस बात पर था कि यहाँ की एम.फिल दूसरे विश्वविद्यालयों की पीएचडी के बराबर हो। एम. फिल. में भी कोर्स वर्क होगा और उसके बाद डिज़र्टेशन- एक साल का कोर्स वर्क और एक साल का डिज़र्टेशन। उस समय एम.फिल. जेएनयू में ही थी, अब तो बहुत सी जगह हो गई है।

इस सेंटर को ऐसा आकार देने का उद्देश्य यह भी था कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय बौद्धिक रूप से बहुत जागरुक है, तो हमारे हिन्दी के छात्र बौद्धिक रूप से उन्नीस ना हो, उनमें हीनता की ग्रंथि ना पैदा हो। जेएनयू में हिन्दी वालों की अलग पहचान है और होनी चाहिए। अन्य विश्वविद्यालयों की तरह ‘अरे, ये तो हिन्दी पढ़ते है’ वाली बात यहाँ नहीं है। इसी हिसाब से हमने कोर्स भी बनाए हैं। इसलिए कहना चाहिए कि जेएनयू में ऐसा विभाग बना, जो दूसरे विश्वविद्यालयों के लिए एक मॉडल बन सके। हमारी चुनौती यह भी थी कि हमारे हिन्दी के विद्यार्थी सामाजिक विज्ञान के छात्रों से बौद्धिक दृष्टि से हल्के ना हों, उसका विज़न व्यापक हो। मेरी कोशिश यह भी थी कि संस्कृत के सूत्र ज़रूर होने चाहिए। जेएनयू में संस्कृत के अनुकूल दृष्टि नहीं थी। यहाँ संस्कृत बहुत देर से आई, वह भी अलग। भाषा विज्ञान के लोग पहले आ गए थे लेकिन संस्कृत के नहीं आए।

जेएनयू एक शिक्षा संस्थान मात्र नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक केन्द्र है। यही सोचकर हमने ऐसा सेंटर बनाने की कोशिश की। विश्वविद्यालयों में एक वर्ण व्यवस्था भी होती है जिसमें लोग हिन्दी को हाशिए की चीज समझा करते हैं और अंग्रेजी को अच्छा समझते हैं जबकि हमारे यहाँ उस समय अंग्रेजी विभाग बना ही नहीं था, बहुत बाद में बना। भाषा संस्थान में विदेशी भाषाएँ ज्यादा है, उनमें अंग्रेजी खो जाती है तथा अलग पहचान भारतीय भाषाओं की बनती है और हीनता की यह भावना कि ‘हम हिन्दी पढ़ते हैं’- नहीं रहती है। हमारा छात्र जेएनयू में उतने ही सम्मान का अधिकारी है, उतना ही स्वाभिमान उसको है, जितना कि दूसरों को। हमारे सामने चुनौती हिन्दी को बौद्धिक रूप से सामाजिक विज्ञान संस्थान और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान के बराबर लाने की थी, विज्ञान के केन्द्र तो उस समय तक पूरे खुले भी नहीं थे।

Courtesy: The Hindu

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गणपत: उस समय जेएनयू का माहौल कैसा था?

नामवर सिंह: जब नया कैंपस बन गया, तब मैं यहाँ 109 (उत्तराखंड) नंबर में रहता था। नये कैंपस और छात्रावासों में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ हर खंड की अपनी संस्कृति थी। विज्ञान के लोग भी उसमें होते थे, अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के लोग भी थे, समाज विज्ञान के भी होते थे, हम लोग आपस में मिलते थे। सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। क्लासरूम टीचिंग तो अपनी जगह है लेकिन जेएनयू में सबसे महत्त्वपूर्ण यह हुआ कि क्लासरूम के बाहर की संस्कृति भी विकसित हुई। हमारे यहाँ लड़के-लड़कियों को लेकर कोई ग्रंथि नहीं थी। उनको स्वतंत्रता थी और उनमें दायित्वबोध भी था। हमारा छात्रसंघ बहुत मजबूत था और वह एक ताकत था। वह केवल चुनाव नहीं लड़ता था बल्कि विश्वविद्यालय में बहुत सक्रिय भूमिका निभाता था, वर्षभर उसकी गतिविधियाँ होती थी। विश्वविद्यालय में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। उसका चुनाव भी एकदम अलग तरीके से होता था। हमारा छात्रसंघ और जगहों के छात्रसंघों से बिल्कुल भिन्न है। छात्र-छात्राओं का उन्मुक्त मिलना-जुलना, देर रात तक बहसों में शामिल रहना हमारे परिसर की संस्कृति थी। हॉस्टल के बाहर भी हमारे छात्र सांस्कृतिक गतिविधियाँ करते थे, गाते थे, बजाते थे। कई तरह के कार्यक्रम होते थे। मेरे क्वाटर के सामने ही शोपिंग सेंटर था, वहाँ किताबों की दुकान थी, फिर लाइब्रेरी भी नये कैंपस में आ गई थी।

गणपत: आपने देश और दुनिया के कई विश्वविद्यालय देखे हैं, जेएनयू उनसे कैसे विशिष्ट है?

नामवर सिह: जेएनयू में परीक्षा की ओर उन्मुख प्रणाली नहीं है, बल्कि पढ़ना, पढ़ाना और सतत मूल्यांकन की खूबी यहाँ है, यह दूसरे विश्वविद्यालयों में नहीं है। हमारे यहाँ क्लासरूम के अलावा तीन तरह के बौद्धिक केन्द्र हैं। हमारे यहाँ सबसे बड़ा केन्द्र है- पुस्तकालय। पहले यह सप्रू हाउस में हुआ करता था और हमारे यहाँ से बस जाया करती थी। बाद में सप्रू हाउस की पूरी लाइब्रेरी आ गई यहाँ और लाइब्रेरियन डॉ. गिरिजाकुमार बहुत आउटस्टेंडिंग लाइब्रेरियन थे। हमारी लाइब्रेरी बहुत देर तक खुली रहती थी, अब तो रातभर खुलती है। दूसरा- हॉस्टल लाइफ। हॉस्टल हमारे यहाँ केवल खाने-पीने, सोने के लिए नहीं है, बल्कि ये सांस्कृतिक और बौद्धिक केन्द्र हैं। हमारे जेएनयू की खूबी यह है कि हॉस्टल लाइफ भी शिक्षा का एक अंग है। वहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, रात के व्याख्यान होते हैं। और, तीसरा सांस्कृतिक कार्यक्रम। कभी संगीत का कोई कार्यक्रम हो रहा है, कभी नाटक हो रहे हैं, कुछ लोगों के विशेष व्याख्यान हो रहे हैं। ये क्लासरूम के बाहर की शिक्षा के केन्द्र हैं, यहाँ के सांस्कृतिक जीवन के केन्द्र हैं। ऐसा ही एक उदाहरण हमारे यहाँ मनाई जाने वाली होली है। अन्यत्र ऐसी होली नहीं मनाई जाती है, जिसमें अध्यापक, छात्र-छात्राएँ सभी शरीक होते हैं और असंयम की एक चीज़ ऐसी नहीं होती हैं, जो आपत्तिजनक हों। इमरजेंसी के दिनों में छात्रों को सुरक्षा देने का काम अध्यापकों ने किया था कि कहीं हमारा कोई छात्र उसका शिकार न हो जाय। शायद ही ऐसा कोई विश्वविद्यालय हो जहाँ अध्यापकों के क्वाटर और छात्र-छात्राओं के हॉस्टल साथ-साथ हों। हम अध्यापक लोग यह जानते हैं कि हम पर हमारे छात्र-छात्राओं की नजर रहती हैं। यहाँ अध्यापकों और विद्यार्थियों के सहज संबंध बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। सहज इतने कि पानी की कमी हुई तो लड़के-लड़कियाँ अध्यापकों के घर से फ्रिज़ खोलकर पानी पी लेती हैं। यह सब एक ज़माने में हुआ करता था। जेएनयू की यह टीचर-टॉट रिलेशनशिप बेजोड़ है। इसे मैं जेएनयू कल्चर कहता हूँ, जिसके निर्माण का श्रेय हमारे छात्र और छात्राओं को है। हमारे यहाँ छात्राओं के साथ कोई अप्रिय घटना नहीं होती है। शिक्षा के अलावा जेएनयू की यह अपनी संस्कृति है। हमें अपने छात्र और छात्राओं ने बहुत पढ़ाया है। अध्यापकों ने छात्रों को बनाया है लेकिन छात्र-छात्राओं ने भी हमें बनाया है। हमें उनसे बहुत सीखने मिला है। यहाँ एक तरफा मामला नहीं है। इसलिए जेएनयू कल्चर बड़ी चीज है। यह हमारी उपलब्धि है। मैं नहीं समझता कि ऐसी अन्यत्र कहीं है, और हो तो बहुत अच्छा है।

हमारा प्रशासन भी अच्छा है। उसमें भी दूसरी जगहों जैसी नौकरशाही नहीं है। हमारे कुलपति और प्रशासन के अन्य लोगों का स्टाफ और छात्र-छात्राओं के साथ संबंध वैसा ही नहीं है, जैसा दूसरी जगह होता है। किसी और जगह जब चाहे तब कुलपति के यहाँ नहीं जाया जा सकता है। हमारे यहाँ हड़तालें भी होती हैं, हुई हैं और हो रही हैं। राजनीतिक चेतना हमारे यहाँ छात्रों में बहुत ज़्यादा है और हमारा छात्र संघ बहुत महत्त्वपूर्ण संघ है। इसलिए टकराव के अवसर भी आए हैं लेकिन हमारे कुलपति बहुत अच्छे थे। वे ज्यादा मानवीय, संवेदनशील और अकादमिक थे। जब बाहर से कुलपति यहाँ आए तो उन्हें भी जेएनयू कल्चर ने प्रभावित किया, वे भी बदले हैं। हमारे जेएनयू का वाइस चांसलर बहुत दूसरी तरह का होता है। वह अन्य जगहों की तरह अफसर बने हुए नहीं रहते हैं। प्रो. मुनीस रज़ा रेक्टर और डीन थे, क्या कमाल के आदमी थे! उनके घर के पास होली मनाई जाती थी। परंपरागत तौर पर यह माना जाता है कि मुसलमान होली नहीं मनाते हैं लेकिन मुनीस रज़ा को देखिए! उनके घर पर थोड़ा खुदा हुआ था, उसमें पानी भर दिया जाता था और रंग नहीं, फूल तोड़कर उसमें डाल दिए जाते थे जिससे रंग आ जाता था। उसी से होली खेली जाती थी। इसलिए जेएनयू की होली एक अनूठी चीज है और इसके प्रवर्तक प्रो. मुनीस रज़ा थे।

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हम लोगों की यही कोशिश थी कि हमारे छात्र-छात्रा विशिष्ट बन पाए, उन्हें देखकर लोग कहें कि ‘अच्छा! यह जेएनयू से है!’ इसलिए यहाँ कि एक संस्कृति विकसित हुई, कोर्स पढ़ाना तो होता रहता है। अब जेएनयू जाना कम होता है। मैं समग्रता में जेएनयू को देखता हूँ। मैं भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी पढ़ाने वाला अध्यापक था लेकिन मैं अपने आप को उस रूप में नहीं देख पाता हूँ, जेएनयू परिवार के एक सदस्य से अलग किसी रूप में मैं अपने आपको सोच ही नहीं पाता हूँ।

 

गणपत: जेएनयू समुदाय को आप क्या संदेश देना चाहते है?

नामवर सिंह: उन्हें संदेश देने की ज़रूरत नहीं है। मैं समझता हूँ कि वे इस लायक है कि वे दूसरों को संदेश दे, उनके लिए कोई संदेश देने की ज़रुरत नहीं है।

(JNU News, 2015-1)

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