कालेधन का कुचक्र: गणपत तेली

पिछले कुछ वर्षों से स्विस बैंकों (टैक्स हेवन) में भारत के अवैध/काले धन की जमाखोरी का मुद्दा चर्चित विषय रहा है। अलग-अलग व्यक्तियों/एजेंसियों ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में अलग-अलग आंकड़े दिए हैं- ग्लोबल फाइनेंसियल इंटिग्रीटी (जीएफआइ) के अनुसार 462 अरब (बिलियन) अमरीकी डॉलर (1948-2008), सीबीआइ के अनुसार 500 अरब अमरीकी डॉलर (2010 तक), रामदेव के अनुसार 70 खरब (7 ट्रिल्यन) अमरीकी डॉलर। भारत से विभिन्न तरीकों से बाहर जाने वाले काले धन को काले धन की अर्थव्यवस्था (ब्लैक इकॉनोमी) की वृद्धि के रूप में देखा जाता है, जो कालेधन पर काम कर रही टेक्स हेवन टीम के अनुसार 2013-14 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के पचास प्रतिशत से भी अधिक या लगभग 900 अरब अमरीकी डॉलर है। कुछ राजनीतिक दल विदेशों में जमा इस काले धन को भारत लाने का वादा कर यह प्रस्तावित कर रहे हैं कि उससे देश  की सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। यह कहा जा रहा है कि यदि विदेशों में जमा सारा काला धन भारत आ जाता है तो आने वाले कई सालों तक किसी टैक्स की आवश्यकता नहीं रहेगी या देश के हर गाँव को दस करोड़ रुपये (16 लाख डॉलर) मिलेंगे। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव प्रचार में कहा था कि काला धन वापस आने पर हर परिवार के खाते में 15 लाख रूपये आएंगे।

2015-05-31 14.34.09दरअसल, विदेशों में काले धन की जमाखोरी और उसे वापस लाने के संबंध में कई गलत धारणाएँ फैली हुई हैं। राजनीतिक दलों और नेताओं ने अपनी भाषणबाजी में इसे अत्यंत सरलीकृत रूप से पेश किया है, जबकि हकीकत यह है कि काले धन से जुड़े जटिल मुद्दों के बारे में हम लोग बहुत कम जानते हैं। इसलिए काले धन से जुड़ी जटिलताओं को सरल रूप में प्रस्तुत करने और उस पर तथ्यपरक सार्वजनिक बहस के उद्देश्य से प्रो. अरुण कुमार के नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केन्द्र की टैक्स हेवन टीम “स्विस बैंक/ऑफशॉर बैंक, टैक्स हेवन, हवाला : कुछ आम सवालों के जवाब”  शीर्षक से एक पुस्तिका प्रकाशित कर रही है। यह पुस्तिका कालेधन से जुड़ी भ्रामक धारणाओं को दूर करती है और इस मसले से जुड़े मूल प्रसंगों को सरल रूप में प्रस्तुत करती है।

प्राय: ‘स्विस बैंक’ शब्द ‘कालेधन’ के समानार्थी रूप में हमारे सामने आता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर में चल रहे अवैध धन के लेन-देन में स्विटजरलैण्ड का सबसे बड़ा हिस्सा है। यहाँ के कई बैंक और निजी इन्वेस्टमेंट फर्म अवैध धन के प्रभावी रूपांतरण और प्रबंधन के लिए जाने जाते हैं। गोपनीय बैंक खातों को खोलने एवं संचालित करने वाला पहला देश स्विटज़रलैण्ड था, इसलिए यहाँ बैंकिंग गोपनीयता का इतिहास पुराना है। और, इस मामले में दूसरे बैंकों की तुलना में स्विस बैंकों की आज भी साख है। स्विटज़रलैण्ड मॉडल की ‘सफलता’ के बाद ब्रिटेन, नीदरलैण्ड जैसे कई देशों ने अपने उपनिवेशों में ऐसे विशेष केन्द्र स्थापित किये, जिससे कई द्वीप (आईलैण्ड्स) गोपनीय बैंकिंग केन्द्र बन गए। बाद में, अमेरीका जैसे देशों ने अपने ही क्षेत्राधिकार में ऐसे टैक्स हेवन बनाए, जहाँ उक्त सुविधाएँ उपलब्ध हैं। और, आज दुनिया भर में कई देश और शहर टैक्स हेवन के रूप में जाने जाते हैं, जिनमें स्विटज़रलैण्ड के अतिरिक्त, बेल्जियम, बाराम्यूडा, कैमन आइलैण्ड्स, डेलावेर (यूएसए), हॉन्गकॉन्ग, आयरलैण्ड, लग्ज़म्बर्ग, सिंगापुर, लंदन आदि शीर्षस्थ हैं।

ये टैक्स हेवन क्षेत्र (जगह/देश/शहर/द्वीप) कर के मामलों में व्यक्तियों (विदेशियों) और व्यवसायों को अनुकूल अवसर एवं शर्ते उपलब्ध कराते हैं। टैक्स हेवन आकार, प्रकार, समय, नियमों आदि के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। ये ऐसे भौगोलिक क्षेत्र हैं, जो अपने यहाँ किए गए लेन-देन पर कम टैक्स लगाते हैं या टैक्स लगाते ही नहीं है और अपने जमाकर्ताओं तथा निवेशकों की गोपनीयता भी सुनिश्चित करते हैं। इन टैक्स हेवन को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि खातेदार वहां का नागरिक है या सिर्फ टैक्स के फायदे के लिए वहाँ आर्थिक रूप से सक्रिय है।

ये टैक्स हेवन मुख्य धारा के देशों की टैक्स व्यवस्था और टैक्स प्रक्रिया व नियमों का उल्लंघन करते हैं। परिणामस्वरूप बहुसंख्यक लोगों की पीड़ा के बल पर वैश्वीकरण के फायदे ग्लोबल इलीट और शक्तिशाली लोगों के पक्ष में हो जाते हैं। टैक्स हेवन वित्तीय वैश्वीकरण का केन्द्र और आधुनिक व्यवसाय का अभिन्न हिस्सा हैं। हालांकि वे वैधानिक और संप्रभु क्षेत्र हैं, वे अपनी संप्रभुता से अपनी कर दर निर्धारित करते हैं और (सबसे महत्त्वपूर्ण) निवेशकों की गोपनीयता को भी (जो काले धन को छिपाने के लिए महत्त्वपूर्ण है), लेकिन वित्तीय क्षेत्र में उनकी उक्त सक्रियता वैश्विक अर्थव्यवस्था के समानांतर कालेधन की अर्थव्यवस्था को प्रश्रय देती है। इन बैंकों में मुख्य रूप से तीन प्रकार से कमाया गया काला/अवैध धन आता है- व्यावसायिक, भ्रष्ट्राचार और आपराधिक। जिन देशों से यह बेशकीमती पूंजी अवैध रूप से बाहर चली जाती है, उनके सामने कई समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं: गरीबी तथा असमानता में वृद्धि, सरकारी कर राजस्व में कमी, आर्थिक वृद्धि की निम्न दर, निवेश में गिरावट, नीतिगत असफलता, महंगाई की उच्च दर, कर्ज़ में वृद्धि आदि।

अक्सर कही जाने वाली यह बात भी सही नहीं लगती है कि स्विस बैंकों में भारतीयों का धन अन्य सभी देशों के लोगों के कुल जमा धन से अधिक है क्योंकि पिछले बीस वर्षों में रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों से बड़े पैमाने पर धन बाहर गया है। और, टैक्स हेवन टीम के अनुसार भारत से बाहर ले जाया गया सारा काला धन वहाँ के बैंकों में पड़ा नहीं रहता है, बल्कि उसे राउंड ट्रिपिंग आदि के जरिए वापस भारत लाकर कई योजनाओं में निवेश कर दिया जाता है। इसलिए विदेशी बैंकों में जमा धन भारत से बाहर गए कुल धन का एक हिस्सा मात्र ही है। और, उस काले धन का रंग भी आसानी से बदल दिया जाता है। सलाहकारों, ऑडिट संस्थाओं, बैंकों, निजी इक्विटी संस्थाओं, वेंचर कैपिटलिस्ट आदि ने यह सुनिश्चित कर दिया कि सावधानी युक्त योजना से धन का रंग आसानी से बदला जा सकता है।

swiss hindiटैक्स हेवन टीम ने 1948 से अब तक भारत से बाहर गए धन और उस पर अर्जित ब्याज का कुल योग 11 खरब अमरीकी डॉलर अनुमानित किया है। यह अवैध धन की अपोर्चुनिटी कॉस्ट है, न कि इतना धन वहाँ जमा है, इसलिए कोई सरकार इसे वापस भारत नहीं ला सकती है, चाहे वह कितनी ही मजबूत क्यों न हो। काले धन की वापसी में सबसे बड़ा मुद्दा बैंकिंग गोपनीयता का है। 17वीं शताब्दी से स्विटज़रलैण्ड में चली आ रही आर्थिक गोपनीयता की परंपरा 1934 के एक कानून से मजबूत हुई थीं, जब स्विटज़रलैण्ड ने अपने बैंक खातों के सार्वजनिककरण को अपराध बना दिया। यह कानून मुख्य रूप से स्विटजरलैण्ड ने अपने नागरिकों के स्विस बैंकों के खातों (काले धन) की जानकारी हासिल करने के फ्रांसीसी प्रयासों को रोकने के लिए बनाया था। स्विस सरकार अपने बैंकों में रखे गए विदेशी धन के आर्थिक महत्त्व को अच्छे से जानती थी और जानती है। आज भी स्विटज़रलैण्ड का कानून गोपनीयता के उल्लंघन के लिए पचास हजार स्विस मुद्रा और छ: महीने की जेल की सजा देता है। अपने खातों में जमा धन के महत्व के मद्देनज़र ही तमाम टैक्स हेवन गोपनीयता को सुनिश्चित करते हैं।

स्विटज़रलैण्ड या अन्य टैक्स हेवन में कुछ ही अपराध दंडनीय हैं। यहाँ तक कि आतंकवाद या नशीले पदार्थों से संबंधित अपराधों में भी बेसिक रिस्पोंस पाने के लिए अर्ज़ी के साथ सभी सबूत और साक्ष्य पेश करने होते हैं। भारत सरकार यूबीएस में जमा धन को आतंकवाद और नशीले पदार्थों जैसे अपराधों के साथ सीधे जोड़ नहीं पाई इसलिए स्विस अधिकारियों को कुछ भी विस्तृत सूचना देने के लिए मना नहीं पाई थी। सच कहें तो, ‘स्विस बैंकिंग’ और गोपनीयता के कानून वाले देशों से काला धन वापस लाने के लिए सहयोग या समर्थन हासिल करना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि इनका निर्माण और विकास ही अनदेखे, अग्राह्य, अनियमित और बिना कर चुकाए धन को छिपाने, दबाने, पनाह देने, इधर-उधर करने और संचित करने के लिए किया गया है।

काले धन की इस अर्थव्यवस्था के दुष्प्रभाव दुनिया भर में देखे जा रहे हैं। जहाँ एक तरफ इससे विकासशील और पिछ्ड़े देशों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक अपराधों में भी वृद्धि हो रही है। विकसित देशों में पूंजी का आगमन तो होता है लेकिन उन्हें भी अपने समाज में अपराधों की वृद्धि, आतंकवाद और एक हद तक राजस्व के नुकसान के खतरे भी रहते हैं। इसलिए इस समस्या का सुलझना विश्व समुदाय (अमीरों और पूंजीपतियों के नहीं) के हित में है। चूंकि यह वैश्विक परिघटना है, इसलिए इसके समाधान के लिए वैश्विक सहयोग आवश्यक है। कनाडा जैसे देशों ने इस मामले में कुछ अच्छी पहल की हैं, वहाँ अपराध देश में हो या बाहर- एक जैसी कार्रवाई की जाती है। भारतीय संदर्भ में अरुण कुमार ने आरटीआई, राजनीतिक और न्यायिक जवाबदेही को सुनिश्चित करने और बैंकिंग गोपनीयता को समाप्त करने जैसे कई सुझाव दिए हैं, जिनके न होने में धन को चोरी छिपे बाहर ले जाया जाता है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने कई देशों के साथ कई तरह की डबल टेक्सेशन अवोइडेंस एंग्रीमेंट (डीटीएए) भी किए हैं, 2009 में भारत ने ऐसे 78 समझौते किए थे। 2014 में भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार एक विशेष जाँच दल (एसाआइटी) का गठन किया।

दुर्भाग्य से यह समस्या राजनीतिक भी है क्योंकि कई देशों के नेता अपने धन प्रबंधन के लिए इन बैंकों में खाते रखते हैं। ये नेता जानते हैं कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है और इसे कैसे रोका जा सकता है लेकिन वे अपने संकीर्ण स्वार्थों के कारण इस समस्या के समाधान के लिए कुछ ठोस उपाय नहीं करते हैं। इसलिए, इस समस्या के समाधान के लिए हर एक देश में राजनीतिक दबाव बनाना आवश्यक है। टैक्स हेवन टीम के अनुसार इसके लिए विकसित देशों के टैक्स हेवन केन्द्रों के गोपनीयता कानूनों को खत्म कर देना चाहिए और उनके क्षेत्राधिकार के बैंकों को भी अनुशासित किया जाना चाहिए। यदि राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो बहुत कुछ किया जा सकता है। हालांकि इन टैक्स हेवन क्षेत्रों के संप्रभु अधिकारों का मुद्दा महत्त्वपूर्ण है, लेकिन हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि इन अधिकारों के प्रयोग से दूसरे देशों के संप्रभु अधिकारों का हनन होता है और व्यापक रूप से विकास की गति अवरुद्ध होती है।

(जनसत्ता, 15.07.2015)

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