बनास जन – 10: डॉ. रेणु व्यास

एक ज़माना था जब तोपें मुक़ाबिल होने पर अख़बार निकाले जाते थे। आज़ साम्राज्यवादी तोपों से बड़ा ख़तरा नवसाम्राज्यवादी – मात्र सरकार-समर्थित नहीं, वरन् सरकारों की रीति-नीति को संचालित करने वाली संगठित कोर्पोरेटी पूँजी से है। और उतना ही बड़ा ख़तरा इस खुली लूट से जनता का ध्यान बँटाने वाली – मात्र असहिष्णु ही नहीं, घृणा और भय पर आधारित, उनका दोहन करने वाली आक्रामक और हिंसक तेवरों वाली राजनीति से है। या यों कहें कि यह ख़तरा इन दोनों के एक ही पाले में रहते हुए परस्पर गठबंधन से है या फिर विपरीत दिखाई देने वाले पालों में इनके बीच हो रही नूरा-कुश्ती से भी है। यह दोहरा ख़तरा भारत को ही नहीं, पूरी दुनिया को है। ऐसे विषम समय में, जब साहित्यिक सरोकार किसी साहित्यिक आयोजन में भागीदारी या उसका विरोध करने तक सीमित होते जा रहे हों, तब इन ख़तरों के विरुद्ध चेतावनी देती और उनसे संघर्ष को प्रतिबद्ध साहित्यिक पत्रिका एक बहुत बड़ी राहत है। ‘बनास जन’ का दसवाँ अंक इसी प्रतिरोध-चेतना को साहित्यिक स्वर देता है। जिसकी बानगी पत्रिका की शुरुआत में ही ‘अपनी बात’ में मिल जाती है। ‘सम्पादकीय’ को ‘अपनी बात’ में बदलना पत्रिका के सम्पादक की विनम्रता ही नहीं, उसकी सम्प्रेषण-कुशलता है। विनोद पदरज के आत्मकथ्य और कविताओं से साहित्य के लिए अपेक्षित प्रतिबद्धता हमें इस अंक की शुरुआत में ही दिखाई दे जाती है। पदरज जी के शब्दों में कहें तो – ‘‘कविता मेरे लिए मनुष्य होने की निर्विकल्प शर्त है’’।

banas-10‘बनास जन’ के इस अंक की सबसे महत्त्वपूर्ण बात साहित्येतर समझे जाने विषय ‘विश्व व्यापार संगठन और भारतीय कृषि’ को पत्रिका के अग्रलेख के रूप में स्थान देना है। हिन्दी साहित्य की एक बड़ी कमज़ोरी यह रही है कि उसने ‘साहित्य’ को ‘ललित साहित्य’ यानी – कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि तक अपने को सीमित कर लिया था। अध्ययन-अध्यापन में यह कमज़ोरी शायद कुछ समय और चले, पर पत्रिकाओं ने इस घेरे को तोड़ना शुरू कर दिया है; यह एक अच्छा संकेत है। आशा है कि ऐसे लेख पत्रिका अपने हर अंक में प्रसंगतः ही नहीं, अनिवार्यतः देगी। इस अंक में एक और प्रासंगिक लेख ‘हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएँ बनाम अंग्रेज़ी’ है।
इस अंक की एक खास पेशकश तीन उपन्यासों – ‘एक कस्बे के नोट्स’, ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ और ‘चील वाली कोठी’ से संबंधित है। एक तरफ़ इनके रचनाकरों के अनुभव और दूसरी ओर उन्हीं पर समीक्षात्मक आलेख, रचनाकार और पाठक के बीच एक लोकतांत्रिक और दुतरफ़ा संवाद क़ायम करता है। पत्रिका के इसी अंक में वीरेन डंगवाल की कविताएँ और उनकी कविताओं पर एक समीक्षात्मक आलेख शामिल कर, कविता के पाठकों को भी वीरेन जी के काव्य को निकट से जानने की सुविधा दी गई है।
यह पूरा अंक ‘बनास’ के ही पिछले सारे अंकों से अधिक विविधता वाला है, कथ्य की दृष्टि से भी, और विधाओं की दृष्टि से भी। स्तरीयता की रक्षा करते हुए किसी पत्रिका के एक ही अंक में इस विशाल विविधता को समेटना अपने आप में अनूठा सम्पादकीय कौशल है। कविता, ग़ज़ल, कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्त, संवाद, साहित्यिक लेख, शोध-आलेख, आदि सभी इस एक अंक में समाए हुए है। श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा – ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ पर लिखा आलेख और ‘हिन्दी की दलितवादी आलोचना और तुलसीदास’ नामक शोध-आलेख इस विविधता को और अधिक पुष्ट करते हैं, उसे और अधिक पूर्ण बनाते हैं। 14 सामयिक कृतियों की जीवंत समीक्षाएँ इस अंक का अतिरिक्त आकर्षण हैं।
इन सबसे भी बढ़ कर, ‘बनास जन’ के दसवें अंक का आकर्षण रहा – पाँच टुकडों नहीं, पाँच बंधों में – वरिष्ठ और युवा कुल दस श्रेष्ठ कवियों को पढ़ना रहा। विनोद पदरज, वीरेन डंगवाल, ऋतुराज, उमेश चैहान, सुधा अरोड़ा, प्रियदर्शन, प्रभात, अशोक कुमार पाण्डेय, शिरीष कुमार मौर्य, ज्ञानप्रकाश विवेक को एक साथ पढ़ना एक दुर्लभ अवसर है। इतनी सारी अच्छी और मौजूँ कविताएँ एक साथ पढ़ने का अवसर मिलना एक बड़ा उपहार है। यानी यह मानिए कि पत्रिका के इस विविधता-भरे कलेवर में आज की हिन्दी कविता का ‘तार दशक’ छिपा हुआ है।
अंत में, इस अंक के लिए बधाई और अगले अंक के लिए शुभकामनाएँ! पत्रिका का अगला अंक इससे भी बेहतर होगा; इस विश्वास के साथ उस अंक की प्रतीक्षा में ………………….
-डॉ. रेणु व्यास
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी),
यूनिवर्सिटी महारानी काॅलेज,
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
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