ब्रजभाषा पाठशाला: दलपत राजपुरोहित

Dalpat Rajpurohit

Dalpat Rajpurohit

संस्कृत काव्यशास्त्र में दंडी, मम्मट आदि आचार्यों ने ‘लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात्’ को भी कविता करने का कारण या ‘हेतु’ माना है। यानी जन्मजात ‘प्रतिभा’ ही नहीं, लोकव्यवहार के ज्ञान, शास्रों और काव्य के अध्ययन-अन्वेषण द्वारा उत्पन्न निपुणता (व्युत्पत्ति) से भी काव्य रचना संभव है। कुछ इन्हीं आदर्शों से प्रेरित हो, गुजरात के कच्छ राज्य की राजधानी भुज में 18वीं सदी के मध्य में एक स्कूल स्थापित हुआ, जिसे ‘ब्रजभाषा पाठशाला’ या ‘भुज की काव्यशाला’ कहा जाता था। इस पाठशाला के संस्थापक राव लखपत (शासनकाल 1741-61 ई.) स्वयं कवि थे और साहित्य, स्थापत्य, संगीत आदि कलाओं को संरक्षण देने वाले शासक भी। 18वीं सदी के मध्य में शुरू हुई यह पाठशाला 1948 ई०) तक चलती रही, फिर आज़ाद भारत की सरकार ने इसे बंद करवा दिया। यह पाठशाला औपनिवेशिक काल की पूर्वसंध्या से लेकर भारत की आज़ादी तक के कालक्रम में हमारी सोच में हुए बदलाव की अनूठी दास्तान बयान करती है। जैसे-जैसे देश की राजनीतिक-आर्थिक हालत बदली इस पाठशाला को सरंक्षण देने वाली व्यवस्था भी खत्म होती गई और इसका पतन अपरिहार्य हो गया। 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध से भारत की स्वतंत्रता तक हुए इतिहासलेखन, राष्ट्रवादी विमर्श में अपने अतीत के याद रखने वाले तथ्यों से ज़्यादा भुलाई जाने वाली चीज़ें अहम हो गईं। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि आज़ादी के बाद ‘ब्रजभाषा पाठशाला’ को ‘मध्यकालीन’ सोच का वाहक कहा गया, जो ‘आधुनिक’ समाज के लिये ‘उपयोगी’ नहीं थी। आज जब हम सोचने-समझने के उन तरीकों या ज्ञान की उन पद्धतियों की चर्चा करते हैं जिनको औपनिवेशिक सत्ता-तंत्र के दुश्चक्र और हमारे वर्तमान जीवन पर पड़ रहे उसके प्रभाव ने लील लिया है तब यह पाठशाला और इसका इतिहास बहुत कुछ कहता है।

पूर्व औपनिवेशिक काल (लगभग 1800 से पहले) में जहाँ शिक्षा का माध्यम साधारणतया संस्कृत या फ़ारसी हुआ करता था, ब्रजभाषा जैसी जनभाषा में रचित काव्य के महत्व को समझकर, उसे औपचारिक शिक्षा का अंग बनाना कच्छ-दरबार का वाकई एक युगान्तरकारी कदम था। इस पाठशाला में हो रही गतिविधियों से हमें कच्छ दरबार के राजाओं और शिक्षकों की उस जागरुकता का पता चलता है, जो देश-काल के साहित्यिक-सामाजिक परिवेश के गहरे ज्ञान से उपजी थी। उत्तर भारत के दरबारों में प्रचलित ब्रजभाषा काव्य जिसके एक बड़े हिस्से को हम ‘रीति’ कविता कहते हैं, भुज की काव्यशाला में प्रमुख रूप से पढ़ाई जाती थी। रीति-कविता को इस पाठशाला में पढ़ाने का उद्देश्य उस समय की सिद्धहस्त या कुशल काव्य परम्परा को भावी कवियों तक पहुँचाना था। रीति कविता के अलावा इस पाठशाला में दादूपंथी सुन्दरदास के ग्रंथ भी पढ़ाऐ जाते थे, जिन्होंने स्वयं बनारस में शिक्षा पाई थी। सुन्दरदास ने चलती हुई ब्रजभाषा में लोक, धर्मशास्त्र और काव्यशास्त्र आदि विषयों पर कविता की है। बाद में तुलसीदास भी जोड़े गये। नीति, युद्ध-कला, चिकित्सा और ज्योतिष के साथ-साथ अलंकार, छन्द, कोश, व्याकरण आदि विषयों से जुड़े देशभाषा में रचित ग्रंथ इस पाठशाला के पाठ्यक्रम का हिस्सा थे। नये ग्रथों को भी समाज में प्रचलन के आधार पर समय-समय पर पाठ्यक्रम में जोड़ा जाता था। ब्रज के साथ इस पाठशाला में डिंगल और गुजराती काव्य का पठन-पाठन भी होता था। पाठशाला के कवियों ने हिन्दी-उर्दू, फ़ारसी, कच्छी आदि में भी साहित्य लिखा जिसकी ओर बहुत कम विद्वानों का ध्यान गया है। गद्य भी साहित्य लेखन का माध्यम हुआ करता था। आज जब हम शिक्षा-व्यवस्था में अंग्रेज़ी के वर्चस्व और हमारे शासक-वर्ग द्वारा देशभाषाओं और बोलियों के नकार का रोना रोते हैं, तब भुज की यह काव्यशाला देशभाषाओं के प्रति उस समय के शासक-वर्ग की सजगता की मिसाल प्रस्तुत करती है।

इस पाठशाला में पढ़कर ब्रह्मानंद जैसे गुजरात के लोकप्रिय संत हुए, कुछ दरबारी कवि हुए तो कुछ कुशल शिक्षक। 19 वीं सदी में गुजरात में नवीन चेतना फैलाने वाले गुजराती के प्रथम ‘आधुनिक’ कवि’ दलपतराम डाह्याभाई का संबंध भी इसी पाठशाला से रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर राष्ट्रवादी कविता की रचना भी ब्रजभाषा पाठशाला के कवियों ने की। मतलब यह कि पूर्व आधुनिक काल में स्थापित, दरबारी संरक्षण में चल रही यह पाठशाला विविध विचारधाराओं को पैदा करने वाली संस्था थी। जो इसके खुले शैक्षिक वातावरण को दर्शाता है।

भुज की पाठशाला में पढ़ाई का स्तर बहुत ऊँचा था जिसका पता हमें इसकी कठिन परीक्षा प्रणाली से चलता है। पाठ्यक्रम में लगे ग्रंथों पर मौखिक परीक्षा ली जाती थी जिसमें ग्रंथों को स्मृति से सुनाना होता था। विविध छन्दों की जानकारी ग्रंथों को याद रखने में मददगार हुआ करती थी। छन्द-वैविध्य भाषा के नाद-सौन्दर्य को दिखाकर काव्य-पाठ में नीरसता को तोड़ता है, और काव्य को याद रखने में भी सहायक होता है। इस तरह की परीक्षा प्रणाली हमें याद दिलाती है कि भारतीय संस्कृति में मौखिक-परम्परा का अहम स्थान रहा है। लिखित परीक्षा और भी चुनौतिपूर्ण होती थी जिसमें देवनागरी वर्णमाला के बावन अक्षरों को आधार बनाकर किसी विषय पर काव्य रचना करनी होती थी। लिखित परीक्षा का दूसरा हिस्सा किसी लोक प्रचलित कहावत या काव्यमय पंक्ति पर कविता करना होता था जिसे हम ‘पाद-पूर्ति’ (समस्या-पूर्ति) कहते हैं। ‘पाद-पूर्ति’ से किसी कवि के काव्य-परम्परा, कवि-समय, शास्त्र और लोक व्यवहार संबंधी ज्ञान को जाँचा जाता था। इससे छात्र की हाज़िर-जवाबी का पता तो चलता ही था, इस बात का भी परीक्षण होता था कि कोई छात्र परम्परा प्रसिद्ध बात को अपने दिक्-काल के संदर्भ में कैसे मौलिक रूप प्रदान करता है। इस प्रकार पाठशाला के शिक्षकों (जिनमें अधिकतर जैन-आचार्य हुआ करते थे) ने मौखिक-परम्परा और स्मृति को महत्व देकर उसे औपचारिक शिक्षा का अंग बनाया था। ध्यातव्य है कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने इन शिक्षण विधियों को ‘अवैज्ञानिक’ मानकर खारिज कर दिया गया। वर्तमान शिक्षा में जो थोड़ा-बहुत स्थान मौखिकता को मिला भी, तो उसे ‘तोता-रटंत’ मानकर तथाकथित ‘आधुनिकता’ के विपरीत ही समझा गया। इन शिक्षण विधियों को नकारने का कुप्रभाव यह हुआ कि हम ज्ञान के उन माध्यमों, अपने सामूहिक बोध के पीढ़ी दर पीढ़ी संचरण की उन प्रणालियों से कट गये जो औपनिवेशिक काल से पहले भारतीय जीवन में प्रचलित थीं, जिनमें लोग अपने ‘होने’ को व्याख्यायित करते आ रहे थे। छंदमुक्त होकर 20 वीं सदी के काव्य में निसंदेह हमने बहुत कुछ पाया, लेकिन काव्यशास्त्र (छन्दशास्त्र जिसका अहम हिस्सा है) को भूलने की कीमत भी हमें चुकानी पड़ी।

भारतीय संस्कृति में विद्यमान मौखिक परम्परा और स्मृति पर आधारित ज्ञान के माध्यमों से अलगाव, अतीत से वर्तमान के हमारे ‘स्मृति-ध्वंस’ जैसा है। इस बात पर गौर किया जाए कि आज हमारे बहुभाषाई, बहुसांस्कृतिक अतीत को जानने की कितनी लगन हममें रह गई है? कहाँ ऐसा शोध हो रहा है जो हमें उस परिवेश को समझने का बेहतर नज़रिया दे सके? प्राकृत-अपभ्रंश-देशभाषाओं को समझने-समझाने वाले कितने लोग हमें आज के शैक्षिक परिवेश में मिलते हैं? इन सभी सवालों पर विचार करें तो स्थिति की गंभीरता सामने आ जायेगी। ‘ब्रजभाषा पाठशाला’ को निर्मला आसनाणी की एक किताब और फ़्रांसीसी विदुषी फ़्रांसुआ मालीसोन के एक लेख ने विस्मृति के गर्त में जाने से बचा लिया। ‘भुज की काव्यशाला’ जैसी संस्थाओं का गुमनाम हो जाना उस छद्म आधुनिकता के प्रचलित हो जाने की कहानी है जो अतीत से कोई संवाद रखना ही नहीं जानती।

(जनसत्ता, 28.06.2015)

Dalpat Rajpurohit

Lecturer of Hindi-Urdu

Columbia University, New York, USA

Email: dr2474@columbia.edu

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