मीरां का कैननाइजेशन: प्रो. माधव हाड़ा

(मीरां को लोग संत-भक्त और कवयित्री के रूप में जानते हैं। कम लोगों को जानकारी है कि मीरां की यह छवि उपनिवेशकाल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राजपूताना में पोलिटिकल एजेंट और विख्यात इतिहासकार लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉड ने गढ़ी। इसमे उसके साम्राज्यवादी स्वार्थ और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों की निर्णायक भूमिका थी। कालांतर में मीरां की यही छवि इतिहास और साहित्य में चल निकली। मीरां के इस कैननाइजेशन की खोज-खबर माधव हाड़ा (madhavhada@gmail.com) ने मीरां के जीवन और समाज पर एकाग्र वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘पचरंग चोला पहर सखी री’ में ली  है। प्रस्तुत है, इस बहसतलब पुस्तक का तत्संबंधी अंश)

पवित्रात्मा संत-भक्त और असाधारण रहस्यवादी-रूमानी कवयित्री के रूप में मीरां के कैननाइजेशन और छवि निर्माण करने वाली टॉड की मीरां विषयक टिप्पणियां टॉड के ग्रंथों, एनल्स एंड एंटिक्विटीज ऑफ राजस्थान और ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इन वेस्टर्न इंडिया में आई हैं। टॉड के समय तक राजस्थान के इतिहास से संबंधित बहुत सारी सामग्री उपलब्ध नहीं थी। रासो, ख्यात, वंशावली आदि कुछ उपलब्ध ग्रंथों का सहयोग लेने के अलावा टॉड ने भाट, चारण, यति, ब्राह्मण आदि लोगों से सुन-सुन कर ही अपना इतिहास लिखा था। मीरां का उल्लेख मेवाड़ की किसी भी ख्यात, बही, वंशावली आदि में नहीं था, इसलिए टॉड को इसके लिए धार्मिक चरित्र-आख्यानों और जनश्रुतियों पर ही निर्भर रहना पड़ा होगा। यही कारण है कि मीरां विषयक उसकी टिप्पणियों में तथ्यात्मक भूलें रह गई हैं।

Prof. Madhav Hada

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उसने अपने इतिहास में मीरां को राणा कुंभा (1433 ई.) की पत्नी लिखा है, जबकि यात्रा वृत्तांत में वह उसे राणा लाखा (1382 ई.) की पत्नी बताता है। इस संबंध में वह गहरी उलझन में था। उसने अपने इतिहास में इस उल्लेख से संबंधित पाद टिप्पणी में यह लिखा कि यह गलत भी हो सकता, क्योंकि मेवाड़ का इतिहास अभी अनिश्चित है। परवर्ती इतिहासकारों ने नवीन शोधों के आधार पर यह स्पष्ट किया कि मीरां राठौड़वंशी राव जोधा के मेड़ता के संस्थापक पुत्र राव दूदा के चौथे पुत्र रत्नसिंह की पुत्री थी, जिसका विवाह राणा सांगा (1482-1528 ई.) के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। टॉड की ये टिप्पणियां मीरां के जन्म, विवाह आदि की तथ्यात्मक जानकारियों के लिए तो उपयोगी नहीं है, लेकिन इनका इतर महत्त्व बहुत है। इनसे इतिहास में मीरां की प्रतिष्ठा एक असाधारण संत-भक्त और रूमानी और रहस्यवादी कवयित्री के रूप में हो गई। टॉड के इतिहास के पहले भाग के मेवाड़ का इतिहास अध्याय में मीरां विषयक टिप्पणी इस प्रकार है:

कुंभा ने मारवाड़ के श्रेष्ठतम में से एक, मेड़ता के राठौड़ कुल की पुत्री से विवाह किया। मीरांबाई सौंदर्य और रूमानी भक्ति की दृष्टि से अपने समय की सर्वाधिक यशस्वी राजकुमारी थी। उसके द्वारा रचित पद फक्कड़ चारणों की तुलना में कृष्ण भक्तों में अधिक प्रचलित हैं। कृष्ण को संबोधित और उसकी स्तुति में रचित उसके कुछ पद सुरक्षित हैं तथा सराहे जाते हैं। हम यह निश्चपूर्वक नहीं कह सकते कि मीरां ने अपने पति से काव्यात्मक भक्ति प्राप्त की या उनके पति ने उनसे वह अनुभूति प्राप्त की, जिससे वह गीत गोविंद और उत्तर कथा  रच सके। मीरां का इतिहास एक प्रेमाख्यान है और यमुना से लेकर दुनिया के छोर (द्वारिका) तक पूरे भारत में हर मंदिर में उसके आराध्य के प्रति भक्ति की अतिशयता ने अनेक प्रवादों को जन्म दिया। 1

मीरां विषयक टॉड की दूसरी टिप्पणी उसके यात्रा वृत्तांत ट्रेल्वस इन वेस्टर्न इंडिया में है। इस वृत्तांत के बीसवें प्रकरण में वेरावल, आरमरा, गुरेजा, बेट, समुद्री लुटेरों के दुर्ग, विष्णु मंदिर सहित मीरां निर्मित कृष्ण मंदिर का वर्णन आते हैं। टॉड यहां भक्त और कवयित्री राजपूत रानी मीरां संबंधी अपनी धारणाएं इस प्रकार रखता है:

परन्तु जो देवालय मेरे लिए सबसे अधिक आकर्षण की वस्तु सिद्ध हुआ वह था मेरी भूमि मेवाड़ की रानी लाखा की स्त्री सुप्रसिद्ध मीरांबाई का बनवाया हुआ सौरसेन के गोपाल देवता का मंदिर, जिसमें वह नौ (आठ पटरानियां और नवीं मीरांबाई) का प्रेमी अपने मूल स्वरूप में विराजमान था, और निस्संदेह यह राजपूत रानी उसकी सबसे बड़ी भक्त थी। कहते हैं कि उसके कवित्वमय उदगारों से किसी भी समकालीन भाट (कवि) की कविता बराबरी नहीं कर सकती थी। यह भी कल्पना की जाती है कि यदि गीत गोविंद या कन्हैया के विषय में लिखे गए गीतों की टीका की जाए तो ये भजन जयदेव की मूल कृति की टक्कर के सिद्ध होंगे। उसके और अन्य लोगों के बनाए भजन, जो उसके उत्कृष्ट भगवत् प्रेम के विषय में अब तक प्रचलित हैं, इतने भावपूर्ण और वासनात्मक (Sypphi) हैं कि संभवत: अपर गीत उसकी प्रसिद्धि के प्रतिस्पर्धी वंशानुगत गीत पुत्रों के ईर्ष्यापूर्ण आविष्कार हों, जो किसी महान कलंक का विषय बनने के लिए रचे गए हों। परन्तु यह तथ्य प्रमाणित है कि उसने सब पद प्रतिष्ठा छोड़कर उन सभी तीर्थ स्थानों की यात्रा में जीवन बिताया जहां मंदिरों में विष्णु के विग्रह विराजमान थे और वह अपने देवता की मूर्ति के सामने रहस्यमय रासमंडल की एक स्वर्गीय अप्सरा के रूप में नृत्य किया करती थी इसलिए लोगों को बदनामी करने का कुछ कारण मिल जाता था। उसके पति और राजा ने भी उसके प्रति कभी कोई ईर्ष्या अथवा संदेह व्यक्त नहीं किया यद्यपि एक बार ऐसे भक्ति के भावावेश में मुरलीधर ने सिंहासन से उत्तर पर अपनी भक्त का आलिंगन भी किया था। इन सब बातों से अनुमान किया जा सकता है कि (मीरां के प्रति संदेह करने का) कोई उचित कारण नहीं था। 2

इस तरह कुल मिलाकर टॉड ने मीरां के संबंध में धारणा बनाई कि (1) असाधारण सौंदर्य और रूमानी भक्ति के कारण वह अपने समय की सर्वाधिक यशस्वी राजकुमारी थी, (2) उसका इतिहास एक प्रेमाख्यान है, (3) वह उत्कृष्ट कोटि की कवयित्री थी और उसकी कविता जनसाधारण में लोकप्रिय थी, (4) उसने पद-प्रतिष्ठा छोड़ कर कृष्ण के मंदिरों की यात्राएं कीं, (5) अतिशय भक्ति, नृत्य और देशाटन के कारण समाज में उसके संबंध में कुछ लोकावाद भी चले और (6) उसके पति और राणा ने उस पर कभी संदेह नहीं किया। जाहिर है, टॉड ने मीरां के जागतिक स्त्री अस्तित्व के संघर्ष और अनुभव से जाने-अनजाने परहेज करते हुए अपने संस्कार, रुचि और जरूरत के अनुसार उसका एक अमूर्त रहस्यवादी और रूमानी संत-भक्त और कवयित्री रूप गढ़ दिया।

PACHRANG CHOLA PHOTOजेम्स टॉड के इस कैननाइजेशन के दूरगामी नतीजे निकले। राजवंशों के ख्यात, बही, वंशावली आदि पारंपरिक इतिहास रूपों में लगभग बहिष्कृत मीरां को अब राज्याश्रय में लिखे जाने वाले इतिहासों में भी जगह मिलने लगी। श्यामलदास ने मेवाड़ के राज्याश्रय में 1886 ई. में लिखे गए अपने इतिहास वीर विनोद (मेवाड़ का इतिहास) में मीरां का उल्लेख बहुत सम्मानपूर्वक किया है। उन्होंने मीरां के राणा कुम्भा से विवाह की कर्नल टॉड की तथ्यात्मक भूल को दुरुस्त करते हुए लिखा कि “मीरांबाई बड़ी धार्मिक और साधु-संतों का सम्मान करने वाली थी। यह विराग के गीत बनाती और गाती, इससे उनका नाम बड़ा प्रसिद्ध है।”3 स्पष्ट है कि मीरां का यह रूप कर्नल टॉड की मीरां संबंधी कैननाइजेशन से प्रभावित है और इसमें भक्ति और वैराग्य को खास महत्त्व दिया गया है। अलबत्ता श्यामलदास ने पाद टिप्पणी में यह उल्लेख जरूर किया है कि “मीरां महाराणा विक्रमादित्य व उदयसिंह के समय तक जीती रही, और महाराणा ने उसको जो दुःख दिया, वह उसकी कविता से स्पष्ट है।”4 श्यामलदास का वीर विनोद मेवाड़ के समग्र इतिहास पर एकाग्र था और उसमें मीरां विषयक केवल कुछ पंक्तियां और पाद टिप्पणियां ही थीं। वीर विनोद के प्रकाशन के कुछ वर्षों बाद ही 1898 ई. में जोधपुर रियासत के मुहकमें तवारीख (इतिहास विभाग) से संबद्ध मुंशी देवीप्रसाद ने एक पुस्तकाकार विनिबंध मीरां का जीवन चरित्र लिखा। उन्होंने और भी कई इतिहास पुरुषों पर भी इसी तरह के शोधपूण विनिबन्ध लिखे। मुंशी देवीप्रसाद ने दावा किया कि उनकी जानकारियां भक्तमालों और कर्नल टॉड कृत इतिहास से ज्यादा सही और प्रामाणिक हैं। उनके अनुसार मध्यकालीन ग्रंथो की मीरां विषयक जानकारियां ‘तवारीखी सबूत और तवारीखी दुनिया से बहुत दूर’ और ‘अटकलपच्छू और सुनी-सुनाई बातों’ पर आधारित हैं।5 मीरां  के जीवन से जुड़ी कुछ बहु प्रचारित घटनाओं; जैसे अकबर और तानसेन की मीरां से भेंट और मीरां का तुलसीदास से पत्राचार को मुंशी देवीप्रसाद ने ‘भोले-भाले भक्तों की मीठी गप्पें’ कहा।6 उनके अनुसार “भक्तों ने मीरंबाई के सलूक और अहसानों का बदला ऐसी-ऐसी मनोरंजन कथाओं के फैलाने से दिया।”7 इस विनिबन्ध से मीरां के पति, पिता ससुर, जन्म, विवाह आदि से जुड़ी कुछ भ्रांतियों का निराकरण हुआ। उसके पीहर के राठौड़ और ससुराल के सिसोदिया वंश के संबंध में कुछ नई जानकारियां सामने आईं। मुशी देवीप्रसाद ने दावा तो यह किया था कि वे मीरां विषयक वर्णन में भक्तमाल और कर्नल टॉड से ‘ज्यादा सही‘ हैं, लेकिन यथार्थ में ऐसा था नहीं। उनके इस विनिबंध ने भी मीरां के संत-भक्त रूप को ही पुष्ट और विस्तृत किया। उन्होंने भी सहारा तथ्यों के बजाय जनश्रुतियों का ही लिया। इतिहास पर निर्भर रहने के दावे के बावजूद उनकी कुछ सीमाएं थीं। एक तो वे सामंतों के यहां आश्रित थे, इसलिए उनके अतीत के संबध में कोई अप्रसन्नकारी टिप्पणी करने का साहस उनमें नहीं था और दूसरे, मीरां संबधी अपनी अधिकांश जानकारियां उन्होंने श्यामलदास और गौरीशंकर ओझा से पत्राचार कर जुटाई थीं8, जिनका नजरिया सामंती अतीत से अभिभूत कर्नल टॉड से प्रभावित था। मुंशी देवीप्रसाद ने अपने इस निबंध में मीरां से संबंधित कुछ घटनाओं को गप्पें कहकर खरिज कर दिया, लेकिन दूसरी तरफ उससे संबंधित कुछ अपुष्ट संकेतों को बढा-चढा कर इसमें शामिल भी कर लिया। उनके द्वारा अतिरंजित ये संकेत इस प्रकार हैं:

  1. “मीरांबाई को भी बचपन से ही गिरिधरलाल जी का इष्ट हो गया था और वे उनकी मुरति से दिल लगा बैठी थीं और ससुराल में गई जब भी उसको अपने साथ इष्टदेव की तरह ले गई थीं और अब जो विधवा हुईं तो रात-दिन उसी मूरति की सेवा पूजा जी जान से करने लगीं।”9
  2. (पति भोजराज की मृत्यु के बाद) “मीरांबाई ने इस तरह ठीक तरुणावस्था से संसार के सुखों से शून्य हो कर अपनी बदकिस्मती का कुछ ज्यादा संताप और विलाप नहीं किया बल्कि परलोक के दिव्यभोग और विलासों की प्राप्ति के लिए भगवत् भगति में एकचित्त रत होकर इस असार संसार को स्वप्न तदवत संपति का ध्यान एकदम से छोड़ दिया।”10
  3. (चितौड़ से लौटकर) “मीरांबाई का क्या परिणाम हुआ यह तवरीखी वृत्तांत की तरह तो कुछ मालूम नहीं लेकिन भगत लोग ऐसा कहते हैं कि वे द्वारिका जी के दर्शन करने को गईं थीं वहां एक दिन ब्राह्मणों के धरना देने से जिन्हें राणा ने उनको लौटा लाने के वास्ते भेजा था, यह पद गाया- मीरां के प्रभु मिल बिछड़न नहीं कीजे– और रणछोड़ जी की मूरति में समा गई।”11

pachrangमीरां विषयक इन उल्लेखों का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं था। मुंशी देवीप्रसाद इनकी पुष्टि केवल ‘ऐसा कहते हैं’ से करते हैं। इस तरह कमोबेश वे भी उन्हीं जनश्रुतियों का सहारा लेते हैं, जिनको पहले वे ‘अटकलपच्छू और सुनी-सुनाई बातें’ कहकर खारिज कर देते हैं। स्पष्ट है कि ऐतिहासिक होने के दावे के साथ प्रस्तुत इन अनैतिहासिक जानकारियों से मीरां के संत-भक्त रूप के विस्तार और पुष्टि में ही मदद मिली। सत्ता के साथ मीरां के तनावपूर्ण संबंधों पर भी मुंशी देवीप्रसाद कोई नई रोशनी नहीं डालते। इस संबंध में वे भी टॉड की तरह दोष मीरां के साधु-संतों से अत्यधिक मेलजोल को देते हैं। वे लिखते हैं कि “राणाजी ने मीरांबाई को तकलीफ दी क्योंकि उनकी भगति देखकर साधु-संत उनके पास बहुत आया करते थे। यह बात राणा जी को बुरी लगती थी और ये बदनामी के खयाल से उन लोगों का आना-जाना रोकने के वास्ते मीरांबाई के ऊपर सख्ती किया करते थे।”12

मेवाड़ के इतिहास कार्यालय के मंत्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा भी 1928 ई. में मेवाड़ के राज्याश्रय में लिखे गए अपने उदयपुर राज्य के इतिहास में टॉड की धारणा को ही दोहराते हैं। मीरां की लोकप्रियता का उल्लेख जेम्स टॉड ने भी किया था और लगभग इसे ही दोहराते हुए ओझा लिखते हैं कि “हिन्दुस्तान में बिरला ही ऐसा गांव होगा जहां भगवद् भक्त हिंदू स्त्रियां या पुरुष मीरांबाई के नाम से परिचित न हों और बिरला ही ऐसा मंदिर होगा जहां उनके बनाए भजन न गाए जाते हों।”13 ओझा मेवाड़ राजवंश की मीरां से नाराजगी की बात तो स्वीकार करते हैं, लेकिन वे भी कर्नल टॉड, श्यामलदास और मुंशी देवीप्रसाद की तरह इसके लिए दोष मीरां के संत-भक्तों से अत्याधिक मेलजोल को देते हैं। वे लिखते हैं कि “मीरांबाई के भजनों की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी और सुदूर स्थानों से साधु-संत उससे मिलने आया करते थे। इसी कारण विक्रमादित्य उससे अप्रसन्न रहता था और उसको तरह-तरह की तकलीफें देता था।”14 उन्नीसवीं सदी में टॉड और उनके अनुकरण पर श्यामलदास और मुंशी देवीप्रसाद और बीसवीं सदी के आरंभ में गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इतिहास में मीरां की जो लोकप्रिय संत-भक्त स्त्री छवि निर्मित की कालांतर में साहित्य सहित दूसरे प्रचार माध्यमों में यही छवि चल निकली।

 

संदर्भ और टिप्पणियां:

  1. एनल्स एंड एंटिक्विटीज ऑफ राजस्थान, खंड-1, (संपादन: विलियम क्रूक) मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली (लंदन: प्रथम संस्करण, 1920), पुनर्मुद्रण, 1994,, पृ.337
  2. पश्चिमी भारत की यात्रा (हिंदी अनुवाद: गोपालनारायण बहुरा) प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (विलियम एच. एलन एंड कंपनी, लंदन: प्रथम संस्करण, 1839), द्वितीय संस्करण, 1996,, पृ.442
  3. वीर विनोद (मेवाड़ का इतिहास), प्रथम भाग, (राज यंत्रालय़, उदयपुर, प्रथम संस्करण, 1886) , मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, पुनर्मुद्रण, 1986, पृ.371
  4. 4. वही, पृ. 371
  5. मुंशी देवीप्रसाद: मीरांबाई का जन्म चरित्र, बंगीय साहित्य परिषद, कोलकाता, 1954 (प्रथम संस्करण, 1898), पृ.1
  6. वही, पृ.28
  7. वही, पृ.28
  8. वही, पृ.10
  9. वही, पृ.11
  10. वही, पृ.10
  11. वही, पृ.26
  12. वही, पृ.12
  13. उदयपुर राज्य का इतिहास, (प्रथम संस्करण, 1928), राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, पुनर्मुद्रण, 1996-97, पृ.359
  14. 14. वही, पृ.360
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