मीडिया: कितना हकीकत, कितना अफ़साना: गणपत तेली

पुस्तक समीक्षा- सीढ़ियां चढ़ता मीडिया, माधव हाड़ा, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा

जनसंचार या मीडिया के व्यापक इतिहास का प्रारंभ छापाखाने के अविष्कार के साथ होता है। छापाखाने के अविष्कार ने जहाँ एक तरफ छपाई का काम आसान कर दिया था, वहीं कम समय, श्रम और लागत के कारण लोक भाषाओं में भी सूचनाओं का प्रसारण प्रारंभ हुआ। जाहिर सी बात है कि यह एक ऐतिहासिक विकास था। यहाँ तक कि प्रबोधन, राष्ट्रवाद जैसी धारणाओं और सिद्धांतों के पीछे भी छापाखाने की भूमिका को उल्लेखनीय माना जाता है। संचार के इतिहास में इसी तरह के ऐतिहासिक बदलाव प्रस्तुत करने वाली दो और परिघटनाएँ सामने आती हैं, वे हैं रेडियो और टेलिविजन का अविष्कार और दूसरी, इंटरनेट का प्रयोग। देश-कालानुरूप इन विशिष्टताओं का उभार हुआ लेकिन इन सब के साथ एक परिघटना अभिन्न रूप से जुड़ी रही और वह है- पूंजीवादी व्यवस्था। पूंजीवादी व्यवस्था के नियंत्रण और नियमन के कारण ही संचार माध्यमों की अपार संभावनाएँ ‘मुनाफे’ के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो गई। इस प्रसंग मिशेल डाउसन और जॉन बेलेमी फॉस्टर ने कुछ कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि

इतिहास यह साबित कर चुका है कि संचार के क्षेत्र में हरेक प्रौद्योगिकीय क्रांति ने, भले ही जनतंत्रीकरण की उसकी संभावनाएँ कितनी ही जबर्दस्त क्यों न हों, सामाजिक तथा आर्थिक सत्ता की पहले से मौजूद व्यवस्थाओं के ही दायरे में बंधे रहने की सूरत में, खुद को सूचना की नई इजारेदारियों का ही साधन बनाया है। (अनुवाद- तरूण कुमार)

madhav sir

प्रो. माधव हाड़ा

अर्थात सिर्फ नई तकनीक आ जाने या उक्त नये ऐतिहासिक विकासों से ही मीडिया या जनसंचार में जनतंत्रीकरण की संभावनाएँ नहीं आ जाती है, बल्कि प्रच्छन्न रूप से वे मौजूदा प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों की पुर्ति करती है।

प्रो. माधव हाड़ा की पुस्तक ‘सीढ़िया चढ़ता मीडिया’ में उदारीकरण के दौर के हिन्दी जनसंचार के संदर्भ में उक्त सैद्धांतिक अवस्थिति का व्यावहारिक निरूपण देख सकते हैं। प्रो. हाड़ा उक्त सिद्धांत से सहमत होते हुए लिखते है कि “प्रिंट मीडिया ने लोकतांत्रिक विचारों के प्रसार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और यह पूंजीवाद के विकास में भी निर्णायक घटक रहा। रेडियो का आविष्कार और व्यापक प्रसार भी औद्योगिक क्रांति के दौरान ही हुआ। इससे संचार प्रक्रिया आसान और तीव्र हुई। रेडियो के प्रभाव और पहुंच का दायरा बहुत बड़ा था इसलिए यह सरकार या समाज प्रभुत्वशाली वर्ग के नियंत्रण में रहा।”अर्थात जनसंचार माध्यम प्रभुत्वशाली वर्गों के नियंत्रण में रहे हैं।

प्रो. माधव हाड़ा की किताब की एक विशिष्‍टता यह है कि इसमें विभिन्न मुद्दों को तर्क, तथ्यों एवं आंकड़ॊं के साथ विश्लेषित किया गया है। हाड़ा जी हिन्दी साहित्य के प्रोफेसर हैं यह इस किताब से स्पष्ट हो जाता है। उन्होंने बड़ी शिद्दत से मीडिया के बदलते स्वरूप का साहित्य पर पड़े प्रभाव का रेखांकन किया है। उन्होंने हिन्दी कहानी पर मीडिया के बदलते स्वरूप का प्रभाव रेखांकित करते हुए लिखा कि “कथा या आख्यान का आधुनिक साहित्य रूप कहानी में कायाकल्प बहुत कुछ इस नए मीडिया की प्रविधि और चरित्र के कारण ही हुआ। कथा या आख्यान में वाचक और सामाजिक का संबंध प्रत्यक्ष था लेकिन कहानी के मुद्रित रूप में संबंध का यह स्वरूप बदल गया। अब कथाकार अज्ञात कल्पित समूहगत पाठक के रूबरू था। इससे कथा की तकनीक और युक्ति में बदलाव आया।” आगे जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विकास हुआ तो कहानी के रूप में और परिवर्तन हुआ। अब कहानी की भूमिका पटकथा सी होने लगी। इसके साथ-साथ प्रो. हाड़ा ने मीडिया के नियामक तत्त्व बाजार के साहित्य पर पड़े प्रभाव को भी विश्लेषित किया कि अब बाजार से प्रेरित साहित्यिक पुस्तकें बाजार में ज्यादा स्थान पा रही है। इस प्रवृति ने गंभीर साहित्य के स्थान को संकुचित किया है। इस परिघटना का नतीजा यह हुआ कि “इलेक्ट्रोनिक मीडिया से प्रारंभिक साहित्यिक कहानी की लोकप्रियता कम हुई है और तमाम दावों के बावजूद उसकी हैसियत अब पहले जैसी नहीं है।” उन्होंने उदय प्रकाश, संजीव, सुरेन्द्र वर्मा, विजयमोहन सिंह, मैत्रेयी पुष्पा, एस.आर. हरनोट, जयनंदन, अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि की कहानियों में आये उक्त बदलावों का उल्लेख किया। लेकिन इस मीडियामय माहौल में कहानी से भी ज्यादा बुरी हालात कविता की हुई है। कहानी तो फिर भी कुछ बदलावों और अलग-अलग रूपों में बनी रही लेकिन कविता के लिये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कोई जगह नहीं बची।

seedhiyan chadhta media‘सीढ़िया चढ़ता मीडिया’ में लेखक ने समग्रता से मीडिया को विश्लेषित किया है, उन्होंने सिर्फ मीडिया का विश्लेषण नहीं किया, बल्कि उसके प्रभावों को भी विश्लेषित किया। टी.वी. के आगमन से पहले शहर-कस्बों के जीवन में किताबों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। बच्चों के लिये तो यह और भी ज्यादा था क्योंकि किताबों के जरिये ही उनकी रचनात्मकता और जिज्ञासाओं का साधारणीकरण होता था। लेकिन यह संबंध अब टूट गया। “किताबों से बच्चों की गहरी और मजबूत दोस्ती में दरार गत सदी के अंतिम दशक में तब पडना शुरू हुई, जब टीवी आया और विस्फोटक ढंग से एकाएक सब जगह फैल गया। किताबें और पत्रिकाएं अब पहले से ज्यादा हो गई हैं, इनमें रंगीन पारदर्शियां और चित्र भी बढ़ गए हैं, सामग्री भी पहले से अधिक और विविधतापूर्ण है, लेकिन बच्चों में इनके लिए कोई खास उत्साह नहीं है। किताबें अब पहले की तरह उनको अपनी दोस्त नहीं लगतीं क्योंकि एक तो टीवी के कैदी हो गए है और दूसरे, टीवी की आदत से उनका किताबों का जायका खराब होने लग गया है।” जाहिर है कि किताबें और कुछ हद तक रेडियो भी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता को मांझते हैं, लेकिन टी.वी. उन्हें खत्म नहीं, तो भी सीमित करती हैं। किताब पढ़ने के बाद व्यक्ति के दिलोदिमाग में उसके वर्णन के बारे में कई बिम्ब और चित्र बनते हैं, लेकिन टी.वी चूंकि बने-बनाये चित्र ही प्रस्तुत करता है इसलिये कल्पनाशीलता का अवकाश ही नहीं रहता है।

दूसरी तरफ लेखक ने टीवी-अखबारों और समाज के अंतर्संबंधों का भी विश्लेषण किया है। एक समय था, जब मीडिया के लिये सामाजिक सरोकार महत्वपूर्ण थे लेकिन अब सरोकारों का स्थान बाजार ने ले लिया है। लेखक ने हिन्दी दैनिकों के बारे साफ लिखा है कि

अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी, भूख, भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण, कुपोषण, जातीयता,  लैंगिक भेदभाव और सांप्रदायिकता जैसे बुनियादी सामाजिक सरोकार अब हिंदी दैनिकों की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हैं। फिलहाल बाजार की दिलचस्पी बढ़ी हुई क्रय शक्ति और उपभोग क्षमता से बड़े उपभोक्ता समूह के रूप में वैश्विक पहचान बनाने वाले भारतीय मध्य वर्ग में है, इसलिए हिंदी दैनिकों ने भी अपने को इस वर्ग पर एकाग्र कर लिया है।

अखबारों के लिये खबरों से ज्यादा महत्वपूर्ण विज्ञापन हो गये हैं। वास्तविक खबरों से उदासीनता इतनी कि विदेशी अभिनेताओं की शादियों जैसे बेगाने मसलों को भी बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जाता है। हिन्दी दैनिकों में पिछले कुछ समय से एक नई प्रवृति विकसित हुई है वह है- क्षेत्रीय संस्करणों का विकास।   प्रो. हाड़ा ने इन संस्करणों के चरित्र की सोदाहरण विस्तार से विवेचना की है। उन्होंने इन अखबारों की भाषा पर भी विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने स्पष्ट बताया है कि एक तरफ जहाँ पर हिन्दी/उर्दू भाषा के इस्तेमाल में कई गलतियाँ और अशुद्ध प्रयोग होते हैं, वहीं पर हिंग्रेजी और हिंग्लिश हिन्दी की पीठ पर सवार हो गई है।

इस किताब की एक उपलब्धि यह भी है कि माधव हाड़ा ने तथ्यों के अलावा कई हिन्दी दैनिकों से विवरण देते हुए अपनी बात साबित की है। इस मायने में यह किताब रेमंड विलियम्स की किताब ‘संचार माध्यमों का वर्ग चरित्र’ की याद दिलाती है, जिसमें उन्होंने अखबारों के पृष्टानुसार प्रकाशित सामग्री का विश्लेषण किया था। इस दृष्टि से माधव हाड़ा की यह किताब में महत्वपूर्ण और संग्रहणीय है।

(प्रगतिशील वसुधा-95, अक्टूबर-दिसंबर-2014 में प्रकाशित)

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मीडिया: कितना हकीकत, कितना अफ़साना: गणपत तेली&rdquo पर एक विचार;

  1. पिगबैक: 2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली | Fifth Floor

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