शिक्षा की कसौटी: गणपत तेली

5thfloorसय्यद मुबीन जेहरा ने ‘पढ़ाई में भटकाव के रास्ते’ (जनसत्ता, 12 अप्रैल) में शिक्षा पर बात करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। उन्होंने ठीक ही बाजारीकरण और निजीकरण के हमले को शिक्षा-व्यवस्था के लिए खतरनाक माना है। निजीकरण और बाजारीकरण के बाद शिक्षा पाने के लिए आम छात्रों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। एक तरफ शिक्षा महंगी और इसके अवसर सीमित होते जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ इसका उद्देश्य सिर्फ रोजगार पाना समझा जाने लगा है। एक बेहतर नागरिक बनाने और समाज के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने से जैसे इसका कोई संबंध ही नहीं रह गया है। कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालयों को छोड़ दें, तो उनमें फीस लगातार बढ़ रही है। कई विश्वविद्यालय फीस के मामले में निजी विश्वविद्यालयों की बराबरी करते प्रतीत होते हैं। 

विद्यालयी शिक्षा से भी धीरे-धीरे सरकारों ने हाथ खींचना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों राजस्थान सरकार ने एकीकरण योजना के नाम पर लगभग सत्रह हजार स्कूलों के विद्यार्थियों और कर्मचारियों को पास के स्कूल में स्थानांतरित कर उन स्कूलों को बंद कर दिया। जहां एक तरफ शिक्षा को लोगों के घर तक पहुंचाने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर इस तरीके से स्कूल बंद कर दिए गए। अब इन बंद स्कूलों की कमी कोई निजी स्कूल पूरा करेगा या फिर वहां कोई स्कूल ही नहीं होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की दूरी बहुत मायने रखती है और विद्यार्थियों को पढ़ाई से ज्यादा मेहनत स्कूल जाने के लिए करनी पड़ती है। विद्यालय-महाविद्यालय दूर होने के कारण कई बच्चे आगे नहीं पढ़ पाते। इसका सबसे ज्यादा खमियाजा लड़कियों को भुगतना पड़ता है।

सरकारी संस्थान सीमित हो रहे हैं, इसलिए निजी शिक्षण संस्थाएं भी इसका फायदा उठा कर अधिक फीस वसूल रही हैं। पिछले कुछ सालों से राजस्थान के विद्यालयों में अध्यापकों की इतनी कमी है कि कई विद्यालयों में एक ही शिक्षक है और वह विद्यालय के प्रशासकीय काम ही कर पाता है। एकीकरण के बाद भले स्कूलों में अध्यापकों की संख्या कुछ बढ़ जाए, लेकिन छात्र-शिक्षक अनुपात में कोई सुधार नहीं होगा। जहां पहले गांव के प्रभावशाली अभिभावक नेताओं-अधिकारियों पर स्कूल के हित सुरक्षित रखने के लिए दबाव बनाते थे, अब वे अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेज कर निश्चिंत हो जाते हैं। समस्या उनके लिए है, जो निजी स्कूलों की फीस नहीं दे पाते हैं। हालांकि एकीकरण की इस योजना की अभी समीक्षा हो रही है और संभावना है कि इसे वापस ले लिया जाए।

हमारे समाज में जहां अधिकतर लोग आज भी शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी पाना मानते हों, वे उच्च शिक्षा के लिए मोटी फीस देना सही नहीं मानते। इसलिए लोग विद्यार्थियों को प्राइवेट या दूरस्थ माध्यम से पढ़ाई करने की सलाह देते नजर आते हैं। दूरस्थ या प्राइवेट माध्यम में विद्यार्थियों को डिग्री मिल जाती है, लेकिन ज्ञान प्राप्ति के अवसर प्राय: नहीं मिलते। मानविकी और समाज विज्ञान के विषय, जिन्हें एक संवेदनशील और समझदार इंसान बनने के लिए आवश्यक माना जाता है, वे आज एकदम नजरअंदाज हो गए हैं। इनकी जगह तकनीकी, मेडिकल या फिर अन्य रोजगारपरक पाठ्यक्रमों को वरीयता दी जाने लगी है।

शिक्षा का उद्देश्य नौकरी मान लेने का सबसे ज्यादा नुकसान यह हुआ कि पाठ्यक्रमों के माध्यम से चाहे कितने भी प्रगतिशील, आधुनिक और विवेकसम्मत विचारों को प्रस्तुत किया जाए, अधिकतर मामलों में वे सिर्फ अगली कक्षा तक पहुंचने की सामग्री बन कर रह जाते हैं। विभिन्न तरह के भेदभावों, अंधविश्वासों और सामाजिक कुरीतियों की आलोचना लगभग सभी पाठ्यक्रमों में की जाती है, लेकिन यह सिर्फ विद्यालयों की चारदीवारी तक सीमित रह जाता है। अध्यापक और छात्र दोनों ही अपने जीवन में उक्त कुप्रथाओं का पालन करते हैं। महिला उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और शोषण, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास, दहेज, बालविवाह आदि सामाजिक कुरीतियों को हम विवेकसम्मत शिक्षा के जरिए ही मिटा सकते हैं, लेकिन हमारे यहां शिक्षा को आधुनिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार का माध्यम नहीं बनने दिया गया है।

कई बार यह देखा गया है कि अगर विद्यार्थी घर-परिवार के लोगों को अपनी किताबों के हवाले से आधुनिक विचारों के बारे में बताता है तो उन्हें अवमानना का शिकार होना पड़ता है। इसलिए शिक्षकों और छात्र-छात्राओं के साथ-साथ अभिभावकों के भी प्रशिक्षण की आवश्यकता है। लेकिन जहां स्कूलों में ही प्रतिक्रियावादी आयोजन होते हों, वहां हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? उदाहरण के लिए, कई जगहों पर स्कूलों में गीता पाठ के आदेश दिए जा रहे हैं, तो दिल्ली में भी नई सरकार ने पीछे न रहते हुए विपश्यना साधना के प्रशिक्षण का आदेश दिया है। नैतिक शिक्षा के नाम पर हम धार्मिक शिक्षा देकर बच्चों की तर्कशीलता ही खत्म कर देते हैं।

शिक्षा एक आजाद देश के नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए और राज्य को इसे निशुल्क उपलब्ध कराना चाहिए। साथ ही, हमें शिक्षा की बेहतर नीतियों के साथ-साथ उन्हें व्यावहारिक ढंग से लागू करने पर भी ध्यान देना चाहिए। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 में ऐसे बहुत से मुद्दों पर बात की गई है, लेकिन व्यवहार में यह सब बहुत कम हो पाया है।

बच्चे के व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास की बात तो दूर, अब भी सूदुर गांवों में बच्चे पिटाई के डर से स्कूल नहीं जाते। जाति, लिंग, धर्म आदि के पूर्वग्रह स्कूलों में अब भी पाए जाते हैं, अंधविश्वासों और सामाजिक कुरीतियों को मिटाने की तो बात ही क्या करें! अगर हम इन मुद्दों को स्कूली शिक्षा के स्तर पर ही संबोधित कर सकें, तो सामाजिक जड़ता को तोड़ने में कुछ आसानी होगी और विद्यार्थियों के स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण होगा।

(जनसत्ता, 19.04.2015)

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