इतिहास बोध और हिन्दी प्रदेश: गणपत तेली

: पुस्तक समीक्षा: देवीशंकर अवस्थी सम्मान (2014) से सम्मानित पुस्तक ‘भारतीय इतिहास बोध का संघर्ष और हिन्दी प्रदेश’ की (बनास जन, मार्च 2014 में प्रकाशित) समीक्षा

jeetendra guptaहिन्दी क्षेत्र के बौद्धिक विकास में हिन्दी नवजागरण का प्रमुख स्थान है। हालांकि विभिन्न नये शोधों द्वारा इस नवजागरण के चरित्र पर सवाल उठाये गए हैं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि  उस दौर में हिन्दी-उर्दू क्षेत्र में पर्याप्त हलचलें हुई। आमतौर पर इस दौर पर बात करने पर मोटे तौर पर दो तरह की अतिशयोक्तियां हमारे सामने आती हैं- एक जो इस दौर को प्रगतिशील मानकर इसे हिन्दी नवजागरण कहती है, तो दूसरी इसे प्रतिक्रियावादी मानकर हिन्दू नवजागरण कहती है। बीसवीं सदी के प्रथम दो दशकों पर केन्द्रित जीतेन्द्र गुप्ता की किताब “भारतीय इतिहास बोध का संघर्ष और हिन्दी प्रदेश” हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया की पड़ताल करते हुए उक्‍त बहस में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। पिछली सदी के पहले दो दशकों की हिन्दी की साहित्यिक और वैचारिक गतिविधियों के केन्द्र में महावीर प्रसाद द्विवेदी थे, इसलिए इस काल को द्विवेदी काल कहा जाता है। प्रस्तुत शोध में संदर्भ के रूप द्विवेदीजी के विचार प्रमुखता से आए हैं। डॉ. जीतेन्द्र गुप्ता ने इस शोध में प्राथमिक स्रोतों के रूप में सरस्वती, भारत मित्र, सम्मेलन पत्रिका, मर्यादा, हिन्दी प्रदीप, धर्म, दिवाकर, स्त्री दर्पण आदि तत्कालीन पत्रिकाओं के विभिन्न अंकों के साथ-साथ उस समय के लेखकों की अन्यत्र संकलित रचनाओं का भी उपयोग किया है। लेखक ने अपने इस शोध को पांच भागों में विभाजित किया है, जो अध्यायों के रूप में वर्गीकृत हैं।  किताब का पहला अध्याय ‘भाषा और साहित्य’ उस दौर की भाषा और साहित्य संबंधी बहसों पर केन्द्रित है। उक्त बहसों से गुजरते हुए जीतेन्द्र ने रेखांकित किया कि भाषा को राष्ट्र का मुख्य तत्व मानकर भारत को राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने के लिए भाषा विमर्श की शुरुआत की गई। इसलिए जीतेन्द्र का मानना है कि भाषा का वह विमर्श राजनीतिक विमर्श था, भाषाशास्त्रीय विमर्श नहीं। उक्‍त विमर्श में हिन्दी को देश के भाषिक एकीकरण के लिए एकमात्र उपयुक्त भाषा घोषित कर दिया गया और बाद के सारी बहसें इस घोषणा को पुष्ट करने के लिए की गई। इस वक्त जब हिन्दी नवजागरण की आलोचना एक फैशन बन चुका है, जीतेन्द्र ने द्विवेदी युग के अंतर्विरोधों को दर्ज करते हुए उस समय की तार्किक और वैज्ञानिक सोच के विकास को रेखांकित किया। आमतौर पर उस युग पर बात करते समय धर्म और धार्मिक समुदायों को केन्द्र में रखा जाता है, लेकिन डॉ. गुप्‍ता ने यह रेखांकित किया कि उस दौर में भाषा को ही केन्द्रीय तत्व माना जा रहा था और धर्म को उसके इर्द-गिर्द परिभाषित किया जा रहा था। संभवतः इसीलिए हिन्दी और उर्दू को हिन्दू और मुसलमानों से जोड़ा गया। दूसरा अध्याय ‘हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया का प्रसार’ है। हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया (पब्लिक स्फियर) के विकास का विश्लेषण करते हुए लेखक इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया का विकास आलोचना के बदले हुए आधार के अनुरूप होता है; और यह बदला हुआ आधार सामाजिकता है। लेखक के शब्दों में,

“लक्षण ग्रंथों पर आधारित रीतिकालीन ‘आलोचना’ पद्धति के उलट इस दौर में सामाजिक विषयों को संबद्ध करते हुए विकसित हुई आलोचना विधा को तत्कालीन सार्वजनिक दुनिया के प्रसारण के एक आयाम के रूप में देखा जा सकता है। इसे युगीन परिस्थितियों द्वारा सृजित भी कहा जा सकता है।” (पृ. 71)

Jeeten Bhai

Dr. Jeetendra Gupta

हम इस बात से वाकिफ है कि रीतिकाल में साहित्यालोचन के आधार काव्य लक्षण थे, यथा- नायिका भेद, छंद, अलंकार इत्यादि, लेकिन आलोच्य काल में आलोचना के आधार देश और समाज बन जाते हैं। इस सकारात्मकता को रेखांकित करते हुए भी लेखक ने उस समय के अंतर्विरोधों को नज़रअंदाज नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट दर्शाया कि द्विवेदी जी भी हिन्दी-हिन्दू को आपस में समीकृत कर रहे थे। (पृ. 76) इस तरह से उन्होंने समग्रता से उस समय की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया कि “सारी तार्किक पद्धति अपनाते हुए भी भारतीय सामाजिक व्यवस्था के मूलभूत अंतर्विरोध को चिह्नित करने में तत्कालीन लेखक असफल रहे।” (पृ. 95) तीसरा अध्याय ‘इतिहास, समाज और अर्थव्यवस्था’ उस समय के सामाजिक विमर्शों पर केन्द्रित है। लेखक इतिहास लेखन के संदर्भ में प्राच्यवादी और साम्राज्यवादी इतिहासकारी को खारिज करते हैं कि दोनों ने हिन्दुस्तान को असभ्य बताया। स्थानीय लेखकों की इतिहास दृष्टि पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी के लेखकों द्वारा की गई अतीत की तारीफ से अंग्रेजी इतिहास का प्रतिपक्ष रचते हुए अंग्रेजों के सभ्य होने के दावों को चुनौती दी। इस सदंर्भ में उन्होंने रेखांकित किया कि साम्राज्यवादी इतिहास का प्रभाव हिन्दी के लेखकों पर भी पड़ा। (पृ. 101) लेखक ने इस विशेषता को रेखांकित किया कि उस दौर के लगभग सभी लेखकों ने इतिहास से संबंद्ध किया (पृ. 103) और इतिहास की उनकी समझदारी सूदुर अतीत से लगाव, मध्यकाल की उपेक्षा-निन्दा तथा वर्तमान अंग्रेजी शासन की आलोचना की थी। (पृ. 110) जीतेन्द्र ने महावीर प्रसाद द्विवेदी की संपत्तिशास्त्र, राधमोहन गोकुल की देश का धन और सखाराम देउस्कर की देशेर कथा  का देश की बात  नाम से हिन्दी अनुवाद के प्रकाशन और समकालीन लेखन में  उभरे आर्थिक मुद्दों पर रोशनी डालते हुए यह बताया कि उस दौर के अकादमिक विमर्शों में आर्थिक प्रश्‍नों की भी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति थी। लेखक ने ठीक ही निष्कर्ष निकाला कि उन बहसों में “आर्थिक प्रश्नों की उपस्थिति महज संयोग न होकर, एक सचेत तार्किक प्रक्रिया का अंग थी।“ (पृ. 113) उक्‍त सचेत तार्किक प्रक्रिया उस शोषक औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की विरोधी थी, जिसने न केवल हिन्दुस्तान के पूरे अर्थतंत्र को चौपट कर दिया, बल्कि लाखों लोगों को मौत के मुँह में ढकेल दिया। इतिहास, समाज और आर्थिक प्रश्नों पर हो रही ये बहसें उस समय के साहित्यिक वातावरण को अभिव्यक्त करती है कि जिसमें सामाजिक सरोकारों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। डॉ. जीतेन्द्र गुप्‍ता ने इस संबंध में ठीक ही विश्लेषित किया है कि “सार्वजनिक दुनिया में बहस किसी निश्चित ढर्रे पर आधरित नहीं थी, बल्कि स्थिति यह थी कि यदि किसी बहस में आंतरिक रूप से प्रगतिशील विचार निहित है तो विषयगत बाध्यता न स्वीकारते हुए, उसके राजनीतिक आयामों को उसमें संलग्न करने की प्रवृत्ति थी। इसका सीध उद्देश्य पाठकों को राजनीतिक रूप से सचेत और सक्रिय करना था।“ (पृ. 126) हिन्दी की बहसों के इस मह्त्त्वपूर्ण पक्ष को रेखांकित करते हुए जीतेन्द्र ने उन प्रवृतियों का भी उल्लेख किया है जो प्रगतिशील नहीं थीं। चौथे अध्याय ‘हिन्दी भाषा और राजनीतिक प्रभुत्व’ में लेखक ने यह दिखाया कि “खड़ी बोली हिन्दी के प्रसारण में एक ओर सामाजिक विकास ने गंभीर भूमिका निभाई, वहीं भौतिक जरूरतों, जिसमें आजीविका की संभावनाओं से लेकर साहित्यिक संभावनाओं तक ने गहरी भूमिका निभाई।” (पृ. 147) आलोच्यकाल से पहले के साहित्यिक परिदृश्य में मनोरंजन को ही साहित्य का उद्देश्य माना जाता था, लेकिन अब साहित्य में राजनीतिक प्रश्न उभर रहे थे। राजनीतिक प्रश्नों का यह उभार औपनिवेशिक शासन के प्रभावों का विरोध कर रहा था। जीतेन्द्र ने ठीक ही रेखांकित किया कि हिन्दी आलोचना के युगीन मानक साहित्यिक न होकर, राजनीतिक-सामाजिक आवश्यकताओं के अनुकूल थे। इस अध्याय में उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त, वृंदावनलाल वर्मा, पंडित बालकृष्ण भट्ट, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, श्यामसुन्दर दास, बाबू देवकीनन्दन खत्री, श्रीधर पाठक, गणेश शंकर विद्यार्थी, बालमुकुन्द गुप्त, जगन्नाथ दास रत्नाकर, सियारामशरण गुप्त आदि साहित्यिक शख्सियतों के योगदान का मूल्यांकन भी किया। हिन्दी उपन्यासों में उक्त युग को ऐयारी और जासूसी परक उपन्यासों की लोकप्रियता के लिए जाना जाता है। जीतेन्द्र ने यह दिखाया कि इस श्रेणी के उपन्यासों का विस्तृत बाजार तो था लेकिन साहित्यिक क्षेत्र में इनका कोई महत्व नहीं था। दूसरी तरफ गंभीर साहित्य का कोई बाजार नहीं था। इसलिए लेखकों के सामने आजीविका का प्रश्न भी रहता था। इस मामले में हिन्दी के लेखकों और संस्थाओं को रियासतों और अंग्रेजों से मदद मिलती थी। (पृ. 164-65) पांचवे अध्याय ‘हाशिये के सामाजिक समूहों’ में महिलाओं और ‘नीची’ जाति के प्रश्नों का विश्लेषण किया गया है। उन्होंने लिखा कि “महिलाओं की जो नई भूमिका निर्मित की जा रही थी, वह पितृसत्ता के बदलते स्वरूप के अंतर्गत ही थी।“ (पृ. 175) यहां तक कि बालविवाह जैसी प्रथाओं का विरोध भी इसलिए किया जा रहा था कि उससे सुदृढ़ पुरूष पैदा नहीं होते हैं। स्त्रियों को शिक्षित करने का उद्देश्य उन्हें जागृत करना नहीं था, बल्कि अच्छी गृहिणी बनाना था। जाति के मुद्दे पर लेखक का मानना है कि उस समय के “विस्तृत सुधारवादी कार्यक्रम के बावजूद भारतीय समाज में विद्यमान असमानता और शोषण के मुख्य कारण को कभी चिह्नित नहीं किया गया। यह मुख्य कारण ब्राह्मणवादी व्यवस्था को निर्मित और पुष्ट करने वाली जाति-व्यवस्था।” (पृ. 192) जाति और जेंडर के मुद्दे उस समय की बहसों में सकारात्मक रूप से नहीं आ पाये थे। हिन्दी नवजागरण में औपनिवेशिक शासन की भूमिका को चिन्हित करना इस किताब की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस क्षेत्र में कई चर्चित शोध उपस्थित हैं, लेकिन वे इस मुकाम पर लगभग असफल रहे और औपनिवेशिक शासन के प्रभावों के परे हिन्दी पब्लिक स्फियर का स्वरूप खोजने के प्रयास किये जबकि जीतेन्द्र गुप्ता ने यह स्पष्ट दिखाया कि हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया में औपनिवेशिक शासन का विरोध एक महत्वपूर्ण मुद्दा था और यहाँ तक कि अन्य कई मुद्‍दें भी इससे संबद्ध थे। दूसरा, इस किताब में लेखक ने उस युग के अंतर्विरोधों को वस्तुनिष्ठता से दर्ज किया है। हम जानते हैं कि औपनिवेशिक काल में भारत एक संक्रमण की अवस्था से गुजर रहा था, उसी संक्रमण में कुछ नई प्रवृत्तियां स्थान ले रही थीं, तो पुरानी प्रवृत्तियां भी पूरी तरह से गई नहीं थीं, बल्कि वे पुरानी प्रवृत्तियां अभी तक नहीं गई हैं। तो उस संक्रमणशील समाज का साहित्य और बौद्धिक दुनिया भी उसी संक्रमण को अभिव्यक्त करने वाला होगा, ऐसे में उस समय के साहित्यिक विमर्शों में अंतर्विरोधों की मौजूदगी स्वाभाविक है और  वस्तुत: कोई भी दौर अन्तर्विरोधों से रहित नहीं होता है। इस तरह से डॉ. जीतेन्द्र गुप्‍ता की यह किताब न केवल हिन्दी नवजागरण से जुड़ी बहसों मे एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है, बल्कि हिन्दी के उन ऐतिहासिक अन्तर्विरोधों की पड़ताल भी है, जिनसे आगे के हिन्दी साहित्य का विकास हुआ है। उक्‍त हस्तक्षेप इसलिये भी महत्त्वपूर्ण है कि आज जब इस दौर पर होने वाले अधिकांश शोधों मे उत्तरआधुनिक प्रवृत्तियों का प्रभाव दिखाई पड़ती है, इस शोध में डॉ. जीतेन्द्र गुप्‍ता ने मार्क्सवादी पद्धति से आलोच्य काल का समग्रता से अध्ययन किया है।

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इतिहास बोध और हिन्दी प्रदेश: गणपत तेली&rdquo पर एक विचार;

  1. पिगबैक: 2015: हिन्दी साहित्य- गणपत तेली | Fifth Floor

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