सड़क पर दौड़ता भय: गणपत तेली

दिल्ली में पिछले दिनों एक टैक्सी चालक द्वारा महिला के साथ बलात्कार किए जाने की घटना के बाद उबेर सहित कुछ टेक्सी सेवाओं पर प्रतिबंध लगाये जाने पर विवाद हो रहा है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह सहित कई लोग इस प्रतिबंध के पक्ष में हैं, तो परिवहन मंत्री नीतिन गडकरी इसके खिलाफ तर्क देते हैं कि यदि ट्रेन में अपराध होता है तो क्या ट्रेन को प्रतिबंधित कर दिया जाता है। साथ ही, कुछ लोग उक्त प्रतिबंध से रोजगार के अवसर घट जाने के कारण भी सहमत नहीं है। गौरतलब है कि दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के कई मामलों में यातायात के साधन लिप्त रहे हैं। bhayचाहे धौला कुंआ के मामले हों या काल सेंटर की टैक्सियों के मामले, दिसंबर 2012 की बर्बर घटना भी बस में ही हुई थी। कुछ वर्षों पहले तक चलने वाली ब्ल्यू लाइन बसों में भी ऐसे अपराध के कई मामले सामने आये थे। इन अनगिनत घटनाओं के अलावा कई ऐसी ‘छोटी’ घटनाओं का महिलाएँ सड़क पर रोजमर्रा के जीवन में सामना करती हैं। भीड़ में होने वाली धक्का-मुक्की और बदतमीज़ियों के अलावा दिल्ली में चलने वाली बसों तथा मेट्रो में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों से कई पुरुष नाखुश रहते हैं। प्राय: महिलाओं को उन सीटों पर बैठे पुरुषों को उठाना पड़ता है। इसके लिए कई बार महिलाओं को लड़ाई-झगड़े और कुतर्कों का सामना करना पड़ता है। कॉमन या जनरल सीटों पर महिलाओं को बैठे देखकर तो कई पुरुष अपनी कुंठा छिपा नहीं पाते हैं। ऑटो वालों से मीटर और किराये के विवाद जल्द ही महिला-पुरुष के खाँचे में आ जाते हैं।

दुखद यह होता है कि अक्सर सीट या छेड़छाड़-छींटाकशी में होने वाले झगड़ों में संबंधित महिला का स्वर अकेला पड़ जाता है। अन्य सवारियों की तो बात ही क्या, कंडक्टर या ड्राईवर भी प्राय: चुप्पी साधे रहते हैं और यदि ड्राईवर ने बस रोक दी, तो बाकी सवारियाँ दोषी को कुछ कहने के बजाय ड्राईवर से ‘देरी करने के कारण’ झगड़ने लगती हैं। जब देश की राजधानी में यह स्थिति हैं, तो दूरदराज के इलाकों में सार्वजनिक परिवहन की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। हाल ही में रोहतक में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते युवकों की पिटाई के समय भी पूरी बस के लोग दर्शक ही बने बैठे थे। यह स्थिति समाज में व्याप्त उस पुरुषवादी और असंवेदनशील मानसिकता की ही अभिव्यक्ति है, जिसमें आवाज़ उठाती महिलाओं की उपेक्षा की जाती है और किसी को मुश्किल हालत में मदद नहीं मिलती हैं। इसकी पराकाष्ठा हम लोग 16 दिसंबर की रात निर्भया मामले में देख चुके हैं, सड़क किनारे घंटे भर घायल हालत में पीड़िता थी और कोई मदद नहीं मिली। कई बार ऐसे मामले भी देखने में आते रहते हैं जिनमें किसी दुर्घटना के बाद चोटिल या घायल लोगों से बेपरवाह वाहन बगल से निकल जाते हैं। कई बार यह भी दिखाई पड़ता है कि यातायात पुलिस या स्वयं वाहन चालक एंबुलेंस के लिए रास्ता खाली करते हैं और उसी समय कोई व्यक्ति अपना वाहन एंबुलेंस के आगे दौड़ाने लगता है। दिल्ली में रात के सार्वजनिक परिवहन की स्थिति बेहद खराब हैं। मेट्रो रात में बंद रहती है और गिनती के कुछ मार्गों पर ही बसें चलती हैं, उन पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में रात्रि में आवागमन असंभव होता है। इन्हीं हालातों में कई लोग टेक्सी पर भरोसा करते हैं। हमारा राजनीतिक नेतृत्त्व सार्वजनिक परिवहन अपनाने के लिए अपील करता है और कभी-कभी कुछ नेता बस-मेट्रो में यात्रा कर रस्म अदायगी भी करते हैं लेकिन सार्वजनिक यातायात को सुविधाजनक और सुरक्षित बनाए जाने का कोई मुकम्मल प्रयास नहीं किया जाता कि लोग उस पर भरोसा कर पाये जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कई लोग रात में काम करते हैं। इसी देश के कई शहरों में देर रात तक सार्वजनिक यातायात उपलब्ध रहता है, जिनमें महिलाएँ भी यात्रा करती हैं जबकि दिल्ली-एनसीआर में रात के दस-ग्यारह बजते-बजते सड़के खाली होने लगती हैं। महिलाओं के खिलाफ जब-जब ऐसे अपराध किये जाते हैं, हमारा राजनीतिक नेतृत्व सुरक्षा के नाम पर सीसीटीवी कैमरे लगाने तथा बसों में और बस स्टेण्ड पर पुलिस या गार्ड तैनात की बात करने लगता है। सीसीटीवी से अपराधियों को पकड़ा जरूर जा सकता है, लेकिन अपराध रोके तो नहीं जा सकते हैं। उदाहरण के लिए सीसीटीवी कैमरे वाले बैंक और एटीएम भी लूटे जा रहे हैं। सेक्युरिटी गार्ड से भी समस्या कितनी हल होगी, सड़क पर पुलिस चैकपोस्ट तो 16 दिसंबर की रात में बस ने भी पार किए थे और उबेर की टेक्सी ने भी। साथ ही, यह बात भी कि सुरक्षा के ये इंतजाम जल्दी ही पुलिसिंग और नैतिक पुलिसिंग में भी तब्दील हो जाते हैं। दिसंबर 2012 के बाद उठे प्रतिरोध के दबाव में सरकार ने कानून भी पास किया और यातायात नियमों में भी सख्ती बरती, लेकिन इन सबके बावजूद दो साल बाद भी उसी पैटर्न पर अपराध हो रहे हैं, इसलिए अब इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। महिलाओं के निर्भय विचरण और सुरक्षित यातायात के लिए यह आवश्यक है कि इसे महिलाओं के लिए बेखौफ आज़ादी के प्रयास से अलग-थलग करके नहीं देखा जाय बल्कि उस अभियान का विस्तार सार्वजनिक यातायात तक किया जाय। इसके लिए आम यात्रियों के साथ-साथ, विशेष रूप से सार्वजनिक यातायात से जुड़े लोगों- बस स्टॉफ, ऑटो-टेक्सी चालक, यातायात पुलिस आदि को जेंडर के मुद्दें पर संवेदनशील बनाया जाना चाहिए और उन्हें हस्तक्षेप के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। स्वयं सेवी समूहों और व्यक्तियों द्वारा ऐसे प्रयास अक्सर किए जाते हैं। अभी भी दिल्ली के कुछ बस मार्गों पर ऐसा ही एक अभियान चल रहा है। लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि परिवहन विभाग इस तरह की पहल करे ताकि इसे एक संस्थानिक स्वरूप मिलें। साथ ही, इस क्षेत्र के आदतन अपराधियों को चिह्नित भी किया जाना चाहिए। इसके साथ ही सार्वजनिक यातायात में बड़े पैमाने पर महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दक्षिण भारत के कई राज्यों की बस सेवाओं में महिलाएँ काम करती हैं। बस चलाने के अलावा, टिकट संग्राहक और टिकट परीक्षक का काम भी वे करती हैं, लेकिन उत्तर भारत में ऐसा प्राय: नहीं देखने मिलता है। यहाँ तक की निजी गाड़ियाँ चलाती महिलाओं के प्रति भी प्राय: पुरुष चालकों की चिढ़ दिखाई पड़ती है। कुछ वर्षों पहले दिल्ली की बसों में कंडक्टर के रूप में महिलाएँ दिखाई देने लगी थीं और दिल्ली मेट्रों में भी महिलाएँ काम करती हैं। इन प्रयासों को व्यापक बनाना होगा। बस, ऑटो, टेक्सियों में महिलाओं का काम करना न केवल सड़क पर लैंगिक अनुपात को सुधारेगा बल्कि महिलाओं को इन भूमिका में पाना महिला यात्रियों के लिए अनुकूल भी होगा। इस मुद्दें को कुछ विस्तार में सार्वजनिक परिवहन से ही जोड़कर देखा जा सकता है कि लूटपाट, अपहरण, मारपीट, लड़ाई-झगड़े, चोरी और अन्य अपराध भी वहाँ होते हैं। इनकी रोकथाम भी सुरक्षित परिवहन के लिए आवश्यक है। राजधानी ही नहीं, बल्कि देश की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था इतनी खराब हैं कि समाज के गरीब तबके के लिए यात्रा और यातना का फर्क मिट जाता है। रेल के अनारक्षित डिब्बों की यही स्थिति है। दिल्ली में भी अमूमन बस या मेट्रो में वृद्धों और बीमार लोगों को चढ़ने में बहुत दिक्कत होती है। दिल्ली के बस स्टैण्डों पर अक्सर सुबह-शाम कई बुजुर्ग और विशेष सक्षमता युक्त लोग एक के बाद एक भीड़ भरी बसों को गुज़रते देखते रह जाते हैं, उस भीड़ में चढ़ पाना उनके लिए संभव नहीं होता है। दिल्ली परिवहन निगम की बसों में तो फिर भी ठीक स्थिति है, क्लस्टर, मेट्रो फीडर और ग्रामीण सेवा के टेम्पो में इन्हें दुर्व्यवहार भी झेलना पड़ता है। इन वाहनों की तेज गति भी कई बार लोगों को चोटिल करती हैं। लंबी दूरी के लिए ऑटो की सुविधा बहुत सीमित है और यह महंगा भी होता है। प्राय: ऑटो वाले मीटर से चलने के लिए तैयार नहीं होते हैं। रेल्वे स्टेशन और हवाई अड्डे के बाहर ऑटो-टेक्सी वाले मनमाने दाम मांगते हैं। प्रीपेड से भी कम दूरी के लिए चलने में आनाकानी करते हैं। रात में बस-मेट्रो के अभाव में यह स्थिति और भी विकट हो जाती है। एनसीआर से दिल्ली आने-जाने के लिए भी पर्याप्त यातायात के साधन नहीं हैं। सार्वजनिक परिवहन की इस हालत के लिए निजीकरण की नीति भी जिम्मेदार है। सरकार निजीकरण का यह तर्क दुहराती है कि प्रतिद्वंद्विता अच्छी सेवाएँ देंगी, लेकिन यही प्रतिद्वंद्विता कई बार दुर्घटनाओं का कारण बनती है। दिल्ली परिवहन निगम की बसे जहाँ तुलनात्मक रूप से व्यवस्थित ढंग से चलती हैं, वहीं क्लस्टर बसें, निजी बसें, मेट्रो फीडर, ग्रामीण सेवा के टेम्पों और इ-रिक्शा प्रतिद्वंद्विता के कारण असुरक्षा के पर्याय बने रहे हैं। लोगों के चढ़ने-उतरने से पहले गाड़ी चला दी जाती है। लोग लटके हुए हैं, दरवाजे खुले हैं और गाड़ी चली जा रही है। यही बात महंगी निजी टेक्सी सेवाओं के साथ भी है। उनके लिए सुरक्षा महज एक व्यावसायिक गुण हैं, जिसके नाम पर ग्राहक आकर्षित किए जा सकते हैं, न कि मानव सुरक्षा का कोई आयाम। इसलिए क्लस्टर या निजी बसों और इन टेक्सी सेवाओं में समस्याएँ एक जैसी होती हैं। इन निजी ‘सेवाओं’ का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है और वे उसी के लिए काम करते हैं। वे जन सेवा नहीं, व्यवसाय करते हैं। इसलिए इस मुद्दे को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए। टेक्सी सेवाओं पर प्रतिबंध से ही समस्याएँ हल नहीं हो जाएगी। यह प्रतिबंध टेक्सी कंपनियों द्वारा नियमों का पालन न करने पर दण्ड से ज्यादा कुछ नहीं है। सरकार के इस कदम से उद्वेलित जनता के चित्त को संतुष्टि ज़रूर मिल गई हो लेकिन मूल समस्या तो मौजूद है ही। इस प्रकार के कुछ प्रतिबंध पहले भी लगाये गए थे लेकिन उसके बाद भी अन्य टेक्सी सेवाओं, बसों, ऑटो में कई आपराधिक घटनाएँ हुई हैं। स्पष्ट है कि जवाबदेह और संवेदनशील सार्वजनिक परिवहन ही हमें इस समस्या के समाधान की ओर ले जा सकता है।

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