मुश्किल होता सफर: गणपत तेली

दीपावली और छठ के अवसर पर रेल गाड़ियों और रेल्वे स्टेशन की अव्यवस्था अब एक वार्षिक घटना हो गई है। यह सर्वविदित है कि पूजा से लेकर छठ तक दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के रेल मार्गों पर यात्रियों की संख्या बढ़ती है, लेकिन रेल्वे द्वारा इस तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। यात्रियों के अनुपात में रेलगाड़ियों की संख्या बहुत कम होती है, भगदड़ मचती है, लोग घायल होते हैं, कुछ काल-कवलित हो जाते हैं। जो ट्रेन में घुस पाने में सफल हो जाते हैं, वे भी बेहद अमानवीय परिस्थितियों में यात्रा करते हैं। आरक्षित डिब्बों में भी पैर रखने की जगह नहीं होती है, लोग फर्श पर, गलियारों में, पैरदान पर और शौचालय में यात्रा करते हैं। बच्चे, बूढ़े और बीमार लोग भी इन अमानवीय परिस्थितियों को झेलते हैं। त्यौहारों और विशेष अवसरों यह तस्वीर कुछ व्यापक हो जाती है, वरना हमारी वीआईपी कही जाने रेल गाड़ियों के अलावा हर रेल के आगे और पीछे लगे अनारक्षित डिब्बों की यह प्राय: हर रोज की कहानी है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो रेल के प्लेटफार्म पर लगने से पहले ही इन डिब्बों में चढ़ने के लिए सामान उठाए गरीब यात्रियों की कतारें लगी रहती हैं, रेल के आते ही पहले चढ़ने के लिए भगदड़ सी मच जाती है, इसमें धक्का-मुक्की, हल्की चोटें आम बात होती हैं। जो जगह पा लेते हैं, वे अपने आपको भाग्यशाली समझते हैं, लेकिन उनका यह भाग्यशाली होना कुछ देर के लिए ही होता है क्योंकि वे भी अपनी जगह ऐसे फँस जाते हैं, सीट पर बैठे रहना भी सजा हो जाती है। कुछ लोग रास्ते भर खड़े और दरवाज़े पर लटके रह जाते हैं, तो कुछ दरवाज़े के ऊपर तथा सामान रखने की बगल वाली पतली-सी ताक पर जगह छेकते हैं और बस जैसे-तैसे लोग गंतव्य पर पहुँच जाते हैं। यह सिर्फ बिहार का मसला नहीं है, देश के किसी भी कोने में चले जाइए, जनरल कहे जाने वाले अनारक्षित डिब्बों की यही तस्वीर मिलेती है। रेल बजट हो या कोई और रेल योजना- अब इन डिब्बों में यात्रा करने वाले अपने लिए कुछ खास नहीं पाते हैं।

वैसे तो रेल की यह तस्वीर सालों पुरानी है, लेकिन अब इसमें एक फर्क दिखाई देता है। पहले नाम के लिए ही सही रेल अपने गरीब यात्रियों को कुछ सुविधाएँ देती थी, लेकिन अब उसे यह भी ज़रूरी नहीं लगता। अब इसकी नीतियाँ अमीरी की सापेक्षता में बनती जा रही हैं, जो जितना गरीब है, वह उतना ही उसकी योजना से बाहर। हाल फिलहाल की अधिकांश योजनाएँ- चाहे प्रीमियम ट्रेन हो, दुरंतो ट्रेन हो, वाई-फाई की सुविधा हो या फिर स्वप्निल बुलेट एवं सेमी बुलेट ट्रेन- सब रेल के अभिजात्य मध्यमवर्गीय यात्रियों के लिए हैं। यही वर्ग अब रेल की योजनाओं के केन्द्र में आता जा रहा है। दूसरी तरफ, हाल के वर्षों में ऐसी कोई योजना याद नहीं आती है, जिसे अनारक्षित दर्ज़े (और कुछ हद तक शयनयान) के लिए लागू किया गया हो, जबकि सबसे ज्यादा लोग इन्हीं दर्ज़ों में सफर करते हैं और ये ही गरीब यात्री धीरे-धीरे हाशिए पर धकेले जाने लगे। गरीब रथ, दुरंतों, प्रीमियम आदि नये प्रकार की रेलगाड़ियाँ से तो यह वर्ग बेदखल ही है। बुलेट ट्रेन जैसी योजनाएँ भी इसी वर्तमान नीति का विस्तार है।

जब-जब रेल से जुड़ी नकारात्मक खबरें आती हैं, सरकार, मंत्रालय, अधिकारी और विशेषज्ञ- सभी एक ही नतीजे पर पहुँचते हैं कि किराया कम है, इसलिए रेल की यह दुर्दशा हो रही है। अब जबकि पिछले तीन-चार सालों में रेल के किराये लगभग डेढ़ गुना बढ़ चुके हैं, प्रीमियम श्रेणी में लोग तीन-तीन गुना ज्यादा किराया देते हैं फिर भी ढाक के वही तीन पात हैं। बढ़े किराये की मार भी सबसे ज्यादा गरीब वर्ग पर ही पड़ी हालांकि हवाई जहाज से बराबरी करते प्रीमियम श्रेणी के वृद्धिशील किराये ने मध्यमवर्ग को भी झटका दिया है। नए निज़ाम में बढ़े बेतहाशा किराये के बाद रेल यात्रियों ने यह उम्मीद पाली थी कि अब उनके भी ‘अच्छे दिन’ आएंगे लेकिन इतनी जेब साफ होने पर भी उन्हें कुछ खास सुविधाएँ नहीं मिलीं।

इन परिस्थितियों में अब यह माना जाना चाहिए कि रेल्वे की दुर्दशा का कारण कम किराया नहीं था। किराया बहुत बढ़ चुका है और रेल की हालत नहीं सुधरी। यदि कम किराया इस दुर्दशा का कारण होता, तो किराया बढ़ने के साथ-साथ रेल दुर्दशा से उबर रही होती। हमारे यहाँ रेल को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि उदारीकृत अर्थव्यवस्था के दौर में इसे व्यवसाय का पर्याय समझ लिया गया है, जिसे मुनाफे में ही चलना चाहिए, चाहे आम जनता को कितनी ही मुश्किलें झेलनी पड़ें। रेल इस देश की जीवनरेखा है, यह पूरे देश को आपस में जोड़ती है और गरीब-से-गरीब व्यक्ति के लिए यातायात को आसान बनाती है। अपने नागरिकों को ऐसी सार्वजनिक सेवा उपलब्ध करवाना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए लेकिन अब इसे भी घाटे-मुनाफे की शब्दावली में परिभाषित कर सरकार इससे पल्ला झाड़ने लगी है। देशाटन से विभिन्न प्रदेश के लोगों के बीच आपस में संपर्क और संवाद स्थापित होते हैं, जिसे नज़रअंदाज कर यह व्यवस्था उल्टा तर्क प्रस्तुत करती है कि लोग इतनी यात्राएँ क्यों करते हैं! यह नया तर्क नागरिकों को जताना चाहता है कि अब रेल के केन्द्र में नागरिक नहीं रह गए हैं। इसी तर्क से नई रेलगाड़ियों को अनावश्यक बताया जाता रहा है, जबकि आज भी कोई ट्रेन खाली नहीं जाती है। सरकार करोड़ों-अरबों रुपये यूँ ही खर्च कर देती है लेकिन रेल्वे की बात आती है तो वित्त मंत्री कहते हैं कि जनता को सुविधाएँ चाहिए तो उन्हें भुगतान करना होगा। जबकि जनता पहले ही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों के मार्फत भुगतान करती है और फिर किराया भी देती है। यहाँ तक कि सरकार के खर्चे भी उसी भुगतान से चलते हैं। और क्या लोकतंत्र में सरकार का यह दायित्व नहीं है कि उन लोगों को भी सुविधाएँ मुहैया करवाये जो भुगतान नहीं कर सकते हैं? यदि भुगतान ही पैमाना है तो फिर सरकारी सेवाओं और निजी व्यवसाय का फर्क ही क्या रह जाएगा?

यह बात सही है कि भारतीय रेल आज दुर्दशा की शिकार है। और हम यह मान भी लें कि इस दुर्दशा के लिए घाटा जिम्मेदार है तो सवाल उठता है कि इस घाटे से उबारने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए, सिवाय कम किराये को कारण मानकर किराया बढ़ाने के? इस मामले में रेल्वे या सरकार को न अपनी योजना की खामियाँ कहीं दिखाई देती हैं और न ही रेल्वे में व्याप्त भ्रष्टाचार। बेहतरीन योजना और भष्ट्राचार दूर कर रेल्वे की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। रेल में लोग यात्रा से पहले भुगतान करते हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर ठगे जाते हैं। रेल गाड़ियों और स्टेशनों पर खाने की खराब गुणवत्ता के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। वातानुकुलित डिब्बे में दिये जाने वाले बिस्तर-तौलिए साफ नहीं होते हैं। अनारक्षित डिब्बों में प्राय: बिजली और पंखे की समस्या होती है। साफ-सफाई का अभाव तो आम बात है, आपको चूहे, कॉकरोच भी दिखाई दे जाएंगे और टिकट की दलाली किससे छुपी है। इन अव्यवस्थाओं के पीछे आर्थिक अनियमितताओं और निजी ठेकेदारों की भूमिका होती है।

आज जब सरकार की वर्तमान रेल नीति घाटे-मुनाफे के आधार पर रेल को सार्वजनिक सुविधा की बजाय व्यवसाय के रूप में देख रही है और इसे (फिलहाल आंशिक रूप से) निजी निवेश के लिए खोल रही है, तो निजीकरण की आशंका होती है। लेकिन कोई निजी निवेशक घाटा उठाने के लिए रेल में पैसा क्यों लगाएगा? क्या वह गरीब यात्रियों के हित में काम करेगा? जाहिर सी बात है कि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक है। उसका प्राथमिक लक्ष्य मुनाफा कमाना होगा, जिसका सबसे बुरा प्रभाव गरीब तबके के यात्रियों पर ही पड़ेगा। घाटे की रट को हम निजीकरण की पूर्वपरिस्थिति के रूप में देख चुके हैं। हमारे देश में सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के लिए प्राय: उस उपक्रम के घाटे में चलने का तर्क दिया गया है, लेकिन निजीकरण के बाद वे उपक्रम सुधर कर अच्छी जनसेवा नहीं करने लगे हैं। मध्य प्रदेश परिवहन निगम इसका एक उदाहरण है। घाटे के नाम पर इसका निजीकरण हुआ और आज आप राज्य की राजधानी भोपाल के आस-पास के इलाकों में यात्रा करने के लिए निजी बस माफियाओं के चक्कर में उलझ जाएंगे।

इसलिए निरंतर घाटे की यह रट, अमीर-गरीब के भेद और निजी निवेश के लिए रेल को खोला जाना इस बात की पर्याप्त आशंका जताता है कि सरकार की नियत इसके पूर्ण नहीं, तो भी आंशिक निजीकरण की है। याद कीजिए कुछ ऐसी ही रट पिछली एनडीए सरकार में भी लगी रहती थी, लेकिन उस सरकार की नीतियों के खिलाफ आए जनादेश का दबाव इतना ज्यादा था कि यूपीए सरकार ने छ:-सात सालों तक इस तरह का कोई काम नहीं किया। अब एक बार फिर नई एनडीए सरकार पिछली सरकार की नीतियों पर दौड़ पड़ी है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आने वाले दिनों में हमें रेल के बारे में बहुत सी अटपटी और दुर्भाग्यजनक खबरें पढ़ने को मिलें। दुर्घटनाओं के अलावा, देरी से चलने, ट्रेन के गुम हो जाने, गलत रास्ते पर चले जाने की खबरे तो आम सी हो गई हैं। इन खबरों का असर यही होगा कि जिस तरह सरकार ‘कम किराया ही रेल्वे की समस्या’ है और ‘सुविधाएँ चाहिए तो भुगतान करना होगा’ जैसे तर्कों को जन मानस में पैठाने में कामयाब हुई है, उसी तरह से इसके अगले चरण में यह बात स्वीकार कराने की कोशिश करेगी कि हमारा रेल्वे सिस्टम नकारा हो गया है, जो निजीकरण के बिना ठीक नहीं हो सकता। यह बहुत चिंताजनक स्थिति होगी। रेल ने इस देश की भौगोलिक और सामाजिक दूरियों को कम करने और विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क तथा संवाद स्थापित करने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इसकी यह भूमिका आज भी प्रासंगिक है, इसलिए समाज के सभी वर्गों के लिए इसके दरवाज़े खुले रहने चाहिए।

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